NIRF 2025 रैंकिंग, जो शिक्षा मंत्रालय द्वारा 4 सितंबर को जारी की गई, में डीयू ने पिछले साल के छठे स्थान से एक पायदान ऊपर चढ़कर पांचवां स्थान प्राप्त किया। इसके कॉलेजों ने भी दबदबा कायम रखा—हिंदू कॉलेज पहले, मिरांडा हाउस दूसरे, हंसराज तीसरे और किरोड़ी मल चौथे स्थान पर। कुल मिलाकर, डीयू के 10 कॉलेज टॉप 20 में शुमार हैं। कुलपति योगेश सिंह ने इसे “विश्वविद्यालय के इतिहास का ऐतिहासिक क्षण” बताया, लेकिन कैंपस के अंदरूनी हलचल कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
चमक के पीछे का अंधेरा
कैंपस में घूमिए तो सन्नाटा ही सन्नाटा नजर आता है। मिरांडा हाउस की प्रोफेसर अभा देव हबीब कहती हैं, “CUET ने प्रवेश को एक बाधा बना दिया है, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए जो कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकते।” प्राइवेट संस्थानों जैसे शिव नादर, अशोका और सिम्बायोसिस ने डीयू का ‘एक्स फैक्टर’ छीन लिया है। अमीर छात्र अब इन्हें प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि डीयू की ‘परिधीय’ कॉलेजों में सीटें खाली पड़ी रह जाती हैं।
शिक्षकों की हालत और भी बुरी है। हाल के वर्षों में भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। मीडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई प्रोफेसरों ने बताया कि नियुक्तियों के लिए रिश्वत की मांग आम हो गई है। अनुभवी प्रोफेसर रिटायर हो चुके हैं या प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में चले गए हैं, जिससे फैकल्टी की गुणवत्ता प्रभावित हुई है। छात्रों का कहना है कि कुछ शिक्षक “पढ़ाने में रुचि ही नहीं लेते” और क्लास में “अजीबोगरीब बातें” करते हैं, जैसे एड्स को “काल्पनिक बीमारी” बताना।
सिलेबस का बोझ भी कम नहीं। NEP के तहत चार साल का अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (FYUP) लागू होने से छात्रों पर दबाव बढ़ गया है। चौथे साल की मॉडालिटी अभी भी अस्पष्ट है, जिससे 70,000 से ज्यादा छात्र भ्रम में हैं। आर्यभट्ट कॉलेज की अर्थशास्त्र लेक्चरर अस्था अहूजा कहती हैं, “छात्र नौकरी या हायर एजुकेशन के लिए थर्ड ईयर के बाद कोर्स छोड़ना चाहते हैं, लेकिन स्पष्टता न होने से परेशान हैं।” परीक्षा शेड्यूल में भी अराजकता है—दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 तक परीक्षाएं चलेंगी, जबकि नए सेमेस्टर की क्लासें भी ओवरलैप होंगी। डीयू टीचर्स फ्रंट (DTF) के महासचिव अभा देव हबीब ने इसे “शिक्षण-सीखने की प्रक्रिया को बाधित करने वाला” बताया।
प्रशासनिक फैसलों का ‘ड्रैकुलियन’ असर
प्रशासन के फैसले भी विवादों में हैं। सितंबर 2024 में जारी नोटिफिकेशन ने सेमेस्टर ब्रेक के दौरान शिक्षकों को शहर छोड़ने पर रोक लगा दी, जिसे DTF ने “ड्रैकुलियन” करार दिया।
अगस्त 2025 में FYUP के चौथे साल के लिए 8 बजे सुबह से 8 बजे रात तक क्लासेस का आदेश आया, जिसे मिथुराज धूसिया ने “छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा के लिए खतरनाक” बताया। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर भी गूंज रही हैं ये आवाजें—एक यूजर ने लिखा, “डीयू का पतन NCR के हर प्रोफेसर ने कन्फर्म किया है, भर्ती में रिश्वत आम हो गई।”
अकादमिक स्वतंत्रता पर भी सेंसरशिप के आरोप हैं। प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं, “शिक्षकों को कोर्स तय करने का अधिकार छीन लिया जा रहा है। छात्रों को ‘शिक्षकों की तानाशाही’ से मुक्त करने का बहाना बनाया जा रहा है।” NIRF रैंकिंग पर भी सवाल उठ रहे हैं। एक यूजर ने एक्स पर शेयर किया कि कॉलेज छात्रों को “कॉपी-पेस्ट पेपर” लिखने के लिए मजबूर कर रहे हैं ताकि रिसर्च स्कोर बढ़े।
क्या है समाधान? एक कॉल टू एक्शन
डीयू का यह पतन भारत के पब्लिक यूनिवर्सिटी सिस्टम के लिए खतरे की घंटी है। छात्र संगठन DUSU ने हाल ही में 10 मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें एसी क्लासरूम, फ्री जिम और हॉस्टल फीस में कमी की मांग शामिल थी। लेकिन बिना सरकारी हस्तक्षेप के सुधार मुश्किल है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को चाहिए कि NIRF की चमक के पीछे छिपे घावों पर ध्यान दें।
डीयू सिर्फ एक यूनिवर्सिटी नहीं, लाखों छात्रों का सपना है। अगर इसे नहीं बचाया गया, तो भारत की शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा अध्याय हमेशा के लिए मिट जाएगा। क्या सरकार सुन रही है? समय बताएगा।

