Controversy over the UGC Equity Regulations 2026 intensifies: सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल, जनरल कैटेगरी में आक्रोश; झूठी शिकायतों के दुरुपयोग का डर

Controversy over the UGC Equity Regulations 2026 intensifies: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा 13-14 जनवरी 2026 को नोटिफाई किए गए प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एड्यूकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशन्स 2026 पर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, लिंग, धर्म और दिव्यांगता आधारित भेदभाव रोकना है, लेकिन जनरल कैटेगरी को बाहर रखने और झूठी शिकायतों के दुरुपयोग की आशंका से व्यापक विरोध हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल हो चुकी है, जबकि कैंपसों पर छात्रों में आक्रोश बढ़ रहा है।

नियमों की मुख्य बातें
• हर उच्च शिक्षा संस्थान को 90 दिनों में इक्विटी कमेटी और इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर बनाना अनिवार्य होगा।
• कमेटी में SC/ST/OBC, महिलाएं और दिव्यांगों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
• भेदभाव की शिकायत पर 24 घंटे में प्रारंभिक कार्रवाई और 15 दिनों में रिपोर्ट देना होगा।
• गंभीर मामलों में पुलिस को सूचना और दोषी पर चेतावनी से निष्कासन तक की सजा का प्रावधान रक्खा गया है।
• उल्लंघन पर UGC अनुदान रोक सकता है या मान्यता रद्द कर सकता है।
• ये नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बने, जो जातिगत भेदभाव के मामलों (जैसे रोहित वेमुला और पायल तड़वी केस) से प्रेरित थे।

विवाद के प्रमुख कारण
विरोधी इन नियमों को रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन बता रहे हैं क्योंकि ये सिर्फ SC/ST/OBC और अन्य हाशिए के वर्गों के लिए हैं, जनरल कैटेगरी को बाहर रखा गया है। झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के खिलाफ कोई स्पष्ट सुरक्षा नहीं दी गई है, जिससे SC/ST एक्ट या दहेज कानून जैसे पिछले दुरुपयोग के उदाहरण याद आ रहे हैं। सोशल मीडिया और कैंपसों पर इसे जनरल कैटेगरी के खिलाफ पक्षपात बताया जा रहा है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि इससे मेरिट और अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल PIL में नियमों को असंवैधानिक और पक्षपाती बताते हुए चुनौती दी गई है। छात्र संगठनों और सोशल मीडिया पर आक्रोश बढ़ रहा है, जहां इसे कानूनी आतंकवाद की नई मिसाल कहा जा रहा है।

बिहार में राजनीतिक चुप्पी के मायने
बिहार में यह मुद्दा सवर्ण बनाम मंडल की पुरानी बहस को फिर से गरमा रहा है। सवर्ण वोटबैंक वाली पार्टियां असमंजस में हैं। भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के प्रवक्ता वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं। कांग्रेस सत्ता पक्ष की आंतरिक कलह का इंतजार कर रही है, जबकि भाजपा में विभिन्न प्लेटफॉर्म पर स्टैंड को लेकर चर्चा चल रही है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सामाजिक जागरण के बिना सिर्फ कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं; इससे नया सामाजिक टकराव पैदा हो सकता है।

UGC का कहना है कि ये नियम संवैधानिक समानता सुनिश्चित करने के लिए हैं, लेकिन विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। आने वाले दिनों में कोर्ट की सुनवाई और राजनीतिक दलों के स्पष्ट रुख से स्थिति और साफ हो सकती है। उच्च शिक्षा में समानता का यह प्रयास कितना प्रभावी होगा, यह समय बताएगा।

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