Controversy deepens over UGC’s new Equity Rules 2026: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार की, सामान्य वर्ग में रोष

Controversy deepens over UGC’s new Equity Rules 2026: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में अधिसूचित ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने संबंधी विनियम 2026’ पर देशव्यापी विवाद तेज हो गया है। इन नियमों को जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लाया गया है, लेकिन आलोचकों का आरोप है कि ये नियम एकतरफा हैं और सामान्य वर्ग के छात्रों-शिक्षकों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा दे सकते हैं। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एपी सिंह ने इन नियमों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि ये नियम सामान्य वर्ग में ऊहापोह की स्थिति पैदा कर रहे हैं। उन्होंने एक बयान में कहा, “आज माननीय सर्वोच्च न्यायालय में जो इतने दिनों से लगातार हमारे देश के सवर्ण वर्ग में ऊहापोह की स्थिति थी जिसके लिए हमारी याचिका डॉ. कुँवर हरिवंश सिंह जी की, जो कि पूर्व सांसद हैं, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, उनके साथ में वरिष्ठ महामंत्री राघवेन्द्र सिंह जी राजू और सभी समाज, सभी संगठन, सभी महासभा सब लोगों ने जो मिलकर लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया है, उसी लड़ाई के तहत हमारी याचिका एडमिट हुई है।”

उन्होंने नियमों पर हमला बोलते हुए कहा, “इसमें साफ तौर पर कहा गया है कि जातिगत भेदभाव यूनिवर्सिटी लेवल पर, डिग्री कॉलेज में नहीं होना चाहिए। छात्रों को राजनीतिक बंटवारे से दूर रखिए। अगर 78 साल में भी हम इस बात पर रहेंगे जिसको किसी ने माना नहीं, इस कानून की किसी ने माँग नहीं की, कभी संसद में चर्चा नहीं हुई, बिना लोकसभा, बिना राज्यसभा में चर्चा किए हुए इसको गजट बना दिया गया UGC ने, जो कि काफी दुखद है।”

डॉ. सिंह ने चेतावनी दी कि इन नियमों से “हमारे छात्रों का Brain Drain होगा, इससे हमारे पेरेंट्स का Economic Drain होगा, लोग विदेशों में जाएंगे।” उन्होंने इसे आम नागरिकों के लिए हानिकारक बताया और कहा, “यही हमारा विरोध है, यही हमारा स्वर है।”

नियमों की मुख्य विशेषताएं और विवाद के कारण
यूजीसी के नए विनियम 2026 राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप हैं, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग आदि आधारित भेदभाव रोकना है। इनमें समान अवसर सेल (Equal Opportunity Cell) का गठन, ओम्बड्सपर्सन की नियुक्ति और शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करना शामिल है। विशेष रूप से जातिगत भेदभाव की परिभाषा पर विवाद है, जिसे आलोचक ‘एकतरफा’ बता रहे हैं क्योंकि यह मुख्य रूप से SC/ST/OBC वर्गों की सुरक्षा पर केंद्रित है और सामान्य वर्ग को ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ से सुरक्षा नहीं देती।

याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इन नियमों से सामान्य वर्ग के छात्रों-शिक्षकों को अनावश्यक रूप से आरोपी बनाया जा सकता है, जिससे कैंपस में तनाव बढ़ेगा। सोशल मीडिया और विभिन्न संगठनों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

सरकार और शिक्षा मंत्रालय का पक्ष
केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया है कि इन नियमों से सामान्य वर्ग के खिलाफ कोई भेदभाव नहीं होगा। मंत्री ने कहा कि ये नियम केवल भेदभाव रोकने के लिए हैं और सभी वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। यह विनियम पुराने 2012 के नियमों की जगह ले रहे हैं, जिनमें प्रवर्तन कमजोर था।

सुप्रीम कोर्ट की स्थिति
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति दी है। याचिकाओं में जातिगत भेदभाव की परिभाषा को ‘जाति-तटस्थ’ बनाने की मांग की गई है। अदालत ने टिप्पणी की कि मुद्दे की गंभीरता को समझा जा रहा है।

यह विवाद उच्च शिक्षा में समानता और भेदभाव के मुद्दे को फिर से उजागर कर रहा है। दोनों पक्षों के तर्कों के बीच मामले की सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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