दिल्ली प्रेस क्लब में बवाल: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग के बीच पुलिस पर बर्बरता के आरोप, रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों के पहुंचने पर हंगामा

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर देश की राजधानी दिल्ली में जारी विरोध-प्रदर्शन अब पुलिस कार्रवाई, पत्रकारों की सुरक्षा और मीडिया की स्वतंत्रता के सवालों तक पहुंच गया है। गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उस समय हंगामे की स्थिति बन गई, जब कुछ लोगों ने नारेबाजी शुरू कर दी। कार्यक्रम में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) की प्रमुख नेहा बोरा और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण सहित अन्य लोग मौजूद थे।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों, युवाओं और पत्रकारों के साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया गया। इसी दौरान पत्रकारों के बीच भी तनाव देखने को मिला। कुछ लोगों को ‘बंद करो, दफा हो जाओ’ जैसे नारे लगाते सुना गया। मीडिया रिपोर्टों में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक समाचार चैनल के पत्रकारों की मौजूदगी के बीच हुए विवाद का भी जिक्र है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों से हंगामे की शुरुआत और उसमें शामिल प्रत्येक पक्ष की भूमिका की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं होती।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुलिस की कार्रवाई पर उठे सवाल

प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम का मुख्य मुद्दा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहा आंदोलन और हाल के दिनों में दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई रहा। अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि पिछले कई दिनों से प्रदर्शन कर रहे छात्रों और युवाओं को प्रशासन की ओर से हटाया जा रहा है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों और विपक्षी नेताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पूछा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध की जगह क्यों सीमित की जा रही है।

नेहा बोरा ने भी पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और प्रदर्शनकारियों की हिरासत का मुद्दा उठाया। उनके मुताबिक, विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज कर रहे पत्रकारों को परेशान किए जाने और उनके उपकरणों को लेकर शिकायतें सामने आई हैं। वक्ताओं ने मांग की कि इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

इन आरोपों को संबंधित पक्षों के आधिकारिक जवाब और जांच के निष्कर्षों के आधार पर परखा जाना बाकी है। दिल्ली पुलिस की ओर से इन विशिष्ट आरोपों पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया आई है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों के पहुंचने पर क्यों हुआ हंगामा?

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान विवाद का एक प्रमुख पहलू पत्रकारों के बीच हुआ टकराव रहा। आपके दिए गए घटनाक्रम के मुताबिक, रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों के वहां पहुंचने के बाद माहौल गरमा गया। इसी दौरान नारेबाजी और शोर-शराबे की स्थिति बनी, जिससे कार्यक्रम बाधित हुआ।

15 अक्टूबर की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में ही कुछ लोगों को ‘बंद करो, दफा हो जाओ’ कहते सुना गया। नेहा बोरा ने आयोजकों से व्यवधान पैदा करने वालों को बाहर ले जाने की अपील की। उन्होंने पत्रकारों से भी शांतिपूर्वक सवाल-जवाब करने और कार्यक्रम को आगे बढ़ने देने का आग्रह किया।

यहां एक अहम सवाल उठता है कि क्या किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों को सवाल पूछने से रोका जाना चाहिए या किसी पत्रकार की मौजूदगी के विरोध में कार्यक्रम बाधित करना उचित है? प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछना पत्रकारों के काम का हिस्सा है, लेकिन सवाल पूछने और जानबूझकर कार्यक्रम बाधित करने के बीच अंतर बनाए रखना भी जरूरी है।

हालांकि, हंगामे के संबंध में रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों का पक्ष और घटना की पूरी, स्वतंत्र रूप से सत्यापित जानकारी सामने आए बिना किसी एक पक्ष को इसके लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

दिल्ली में पत्रकारों की हिरासत का मामला पहले भी उठा

प्रेस क्लब में पुलिस कार्रवाई को लेकर लगाए गए आरोप ऐसे समय सामने आए हैं, जब इससे पहले दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और कथित तौर पर उनके साथ दुर्व्यवहार की खबरें सामने आ चुकी हैं।

रॉयटर्स की 12 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों की कवरेज कर रहे लगभग तीन दर्जन पत्रकारों को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया था। रिपोर्ट में कुछ पत्रकारों के साथ कथित तौर पर धक्का-मुक्की किए जाने और उनके फोन लिए जाने का भी उल्लेख है। पत्रकार संगठनों ने इस कार्रवाई पर चिंता जताई थी और इसे प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर मामला बताया था।

रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने पत्रकारों की हिरासत और उनके साथ हुए कथित व्यवहार के बारे में पूछे गए सवालों का उस समय तत्काल जवाब नहीं दिया था। पुलिस की ओर से यह भी कहा गया था कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने पत्रकार होने का दावा करते हुए पुलिस के काम में बाधा डाली थी। ऐसे में पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच और प्रत्येक मामले के तथ्यों का सामने आना महत्वपूर्ण है।

इससे स्पष्ट है कि मौजूदा विवाद केवल एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुए हंगामे तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल भी है कि विरोध-प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों को अपना काम करने की कितनी स्वतंत्रता मिल रही है और उनके अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग क्यों तेज हुई?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे आंदोलन का संबंध मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर उठे विवाद से है। आंदोलन से जुड़े संगठनों और प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही तय करने और उन्हें पद से हटाने या इस्तीफा देने की मांग की जा रही है।

प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची में हेरफेर किए जाने के आरोपों को खारिज किया है। आयोग की ओर से यह भी कहा गया है कि सत्यापन प्रक्रिया के दौरान गलत तरीके से हटाए गए नामों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत दोबारा दर्ज कराने का विकल्प उपलब्ध है।

इसलिए मतदाता सूची में नाम हटाए जाने के आंकड़ों और उसके पीछे के कारणों को एक ही नजरिए से देखने के बजाय आधिकारिक आंकड़ों, आपत्तियों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर समझना जरूरी है।

यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग करना और उन्हें पद से हटाने की औपचारिक संवैधानिक प्रक्रिया दो अलग-अलग बातें हैं। किसी पदाधिकारी को हटाने की मांग अपने आप में उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को सिद्ध नहीं करती।

16 अक्टूबर को तिरंगा मार्च का आह्वान

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कॉकरोच जनता पार्टी और उससे जुड़े संगठनों ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस में तिरंगा फहराने से जुड़े कार्यक्रम का आह्वान किया है। इसे मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ चल रहे आंदोलन और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार से जोड़कर देखा जा रहा है।

प्रदर्शन से पहले राजधानी के कुछ हिस्सों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किए जाने की संभावना भी जताई गई है। ऐसे में प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ शांतिपूर्ण प्रदर्शन और मीडिया कवरेज के अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करने की चुनौती है।

लोकतंत्र में असहमति और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर बहस

दिल्ली प्रेस क्लब में हुआ हंगामा एक व्यापक सवाल खड़ा करता है—क्या राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों के बीच भी पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से सवाल पूछने और नागरिकों को अपनी बात रखने का अवसर मिल पा रहा है?

लोकतंत्र में सरकार, निर्वाचन आयोग, पुलिस और राजनीतिक संगठनों से सवाल पूछना पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी तरह किसी पत्रकार या समाचार चैनल की रिपोर्टिंग से असहमति होने पर उसका जवाब तथ्यों, सवालों और तर्कों के माध्यम से दिया जा सकता है। किसी भी पक्ष की ओर से हिंसा, धमकी या जानबूझकर व्यवधान पैदा किए जाने के आरोप हों, तो उनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

फिलहाल, प्रेस क्लब की घटना ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग के साथ पुलिस की कार्रवाई और मीडिया की स्वतंत्रता से जुड़े विवाद को फिर चर्चा में ला दिया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुए हंगामे को लेकर संबंधित पक्ष क्या स्पष्टीकरण देते हैं और प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायतों पर क्या कार्रवाई होती है।

 

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