Cash Hall Case: जस्टिस यशवंत वर्मा ने दिल्ली पुलिस को ठहराया जिम्मेदार, कहा- साइट सिक्योरिटी में चूक हुई, मैं पहला रिस्पॉन्डर नहीं था

Cash Hall Case: दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े विवादास्पद ‘जज कैश केस’ में नया मोड़ आ गया है। जस्टिस वर्मा ने संसदीय कमेटी के सामने अपना औपचारिक जवाब दाखिल कर दिया है, जिसमें उन्होंने दिल्ली पुलिस, फायर ब्रिगेड और सीआरपीएफ पर साइट सिक्योरिटी में गंभीर चूक का आरोप लगाया है। जस्टिस वर्मा ने स्पष्ट कहा कि घटनास्थल पर नकदी बरामदगी की कोई पुष्टि नहीं हुई और साइट को सुरक्षित नहीं करने की जिम्मेदारी अधिकारियों की थी, उनकी नहीं।

जस्टिस वर्मा का बचाव: ‘मैं पहला रिस्पॉन्डर नहीं था’
जजेस (इंक्वायरी) एक्ट के तहत चल रही महाभियोग कार्यवाही में जस्टिस वर्मा ने लिखित जवाब में कहा कि अक्टूबर 2024 में उनके सरकारी आवास पर लगी आग की घटना के बाद मौके पर पहुंचने वाले अधिकारियों ने स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया। उन्होंने तर्क दिया कि आग या आगजनी के संदेह में साइट को सील करना और सुरक्षित रखना दिल्ली पुलिस, फायर अधिकारियों और सीआरपीएफ की जिम्मेदारी थी। जस्टिस वर्मा ने सवाल उठाया कि जब संबंधित अधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में नाकाम रहे, तो महाभियोग की कार्रवाई सिर्फ उन पर क्यों थोपी जा रही है?

जस्टिस वर्मा ने यह भी दावा किया कि घटनास्थल से कोई नकदी बरामद नहीं हुई थी, जैसा कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्षी दलों ने प्रचारित किया। उन्होंने इसे गलत जानकारी करार देते हुए कहा कि साइट पर मौजूद अधिकारियों ने कोई उचित प्रक्रिया नहीं अपनाई, जिससे अफवाहें और विवाद पैदा हुआ।

मामले की पृष्ठभूमि
अक्टूबर 2024 में जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने की घटना हुई थी। आग बुझाने के बाद मलबे से कथित तौर पर लाखों रुपये नकद बरामद होने की खबरें आईं, जिसे लेकर विपक्षी दलों ने हंगामा किया। कुछ सांसदों ने जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, जिसमें भ्रष्टाचार और आचार संहिता उल्लंघन के आरोप लगाए गए। मामला संसद की संबंधित कमेटी और सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है।

ताजा स्थिति
संसदीय कमेटी अब जस्टिस वर्मा के जवाब की समीक्षा कर रही है। सूत्रों के अनुसार, कमेटी जल्द ही दोनों पक्षों की दलीलें सुन सकती है। दिल्ली पुलिस और अन्य एजेंसियों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया है, लेकिन मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच जारी है। विपक्षी दल इसे न्यायपालिका की गरिमा से जोड़कर हमलावर हैं, जबकि सत्तापक्ष और कुछ कानूनी विशेषज्ञ कह रहे हैं कि बिना ठोस सबूत के महाभियोग उचित नहीं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन का बड़ा सवाल उठा रहा है। कमेटी की अंतिम रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का रुख आगे की दिशा तय करेगा। मामले पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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