AI की बढ़ती भूख: आज के दौर में चैटजीपीटी (ChatGPT) से कविता लिखवाना हो या एआई (AI) से अपनी फोटो एडिट करना, हम यह भूल जाते हैं कि हर एक ‘प्रॉम्प्ट’ के पीछे मशीनें पसीना बहा रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जितनी तेजी से हमारे दिमाग की जगह ले रहा है, उतनी ही तेजी से यह धरती के जलाशयों को खाली कर रहा है। हालिया रिपोर्ट्स और डेटा की मानें तो एआई मॉडल्स को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होने वाला करोड़ों लीटर पानी भविष्य में एक बड़ी मानवीय त्रासदी का सबब बन सकता है।
डेटा सेंटर्स: पानी पीने वाले आधुनिक ‘राक्षस’
एआई चलाने वाले बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स में हजारों की संख्या में हाई-पावर जीपीयू (GPUs) लगे होते हैं। जब ये प्रोसेसर्स चलते हैं, तो अत्यधिक गर्मी पैदा करते हैं। अगर इन्हें ठंडा न किया जाए, तो सर्वर जल सकते हैं। इस गर्मी को शांत करने के लिए दो मुख्य तरीके अपनाए जाते हैं:
- इलेक्ट्रिसिटी: एयर कंडीशनिंग चलाने के लिए।
- वाष्पीकरण (Evaporation): पानी के जरिए कूलिंग टावर्स को ठंडा रखना।
वैज्ञानिकों के अनुसार, चैटजीपीटी से पूछे गए मात्र 10 से 50 सवालों के जवाब देने में एआई लगभग 500 मिलीलीटर (एक छोटी बोतल) पानी ‘पी’ जाता है। सुनने में यह कम लग सकता है, लेकिन जब करोड़ों लोग इसका इस्तेमाल करते हैं, तो यह आंकड़ा अरबों लीटर तक पहुंच जाता है।
त्रासदी की आहट: रिपोर्ट क्या कहती हैं?
विभिन्न शोध संस्थानों (जैसे कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय) और टेक दिग्गजों की अपनी एनवायरनमेंट रिपोर्ट्स के अनुसार स्थिति चिंताजनक है:
- माइक्रोसॉफ्ट और गूगल की बढ़ती प्यास: रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में टेक दिग्गजों के पानी की खपत में 20% से 34% तक की वृद्धि देखी गई है। यह सीधे तौर पर एआई के बढ़ते चलन से जुड़ा है।
- स्थानीय जल संकट: डेटा सेंटर्स अक्सर उन इलाकों में बनाए जाते हैं जहां बिजली सस्ती हो, लेकिन वहां पानी की कमी हो सकती है। स्थानीय समुदायों को डर है कि एआई उनकी खेती और पीने के पानी के हिस्से पर कब्जा कर रहा है।
- प्रच्छन्न खपत (Hidden Consumption): सिर्फ कूलिंग ही नहीं, बल्कि डेटा सेंटर्स को दी जाने वाली बिजली पैदा करने में भी भारी मात्रा में पानी खर्च होता है।
क्या यह भविष्य के लिए खतरा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एआई की दक्षता (Efficiency) नहीं बढ़ाई गई, तो साल 2027 तक एआई की पानी की मांग 4.2 से 6.6 बिलियन क्यूबिक मीटर तक पहुंच सकती है। यह मात्रा डेनमार्क जैसे छोटे देश की कुल वार्षिक जल खपत से भी ज्यादा है।
चुनौती यह है कि हम एक तरफ डिजिटल क्रांति चाहते हैं और दूसरी तरफ जीवन के लिए अनिवार्य संसाधन यानी पानी को दांव पर लगा रहे हैं।
समाधान की तलाश
टेक कंपनियां अब इस समस्या से निपटने के लिए “वाटर पॉजिटिव” (Water Positive) होने का दावा कर रही हैं, जिसमें वे जितना पानी इस्तेमाल करती हैं, उससे ज्यादा जलाशयों में वापस भरने का लक्ष्य रखती हैं। इसके अलावा:
- समुद्र के ठंडे पानी का इस्तेमाल।
- डेटा सेंटर्स को ठंडे देशों (जैसे आइसलैंड) में शिफ्ट करना।
- कम पानी सोखने वाली कूलिंग तकनीकों का विकास।
निष्कर्ष: एआई निस्संदेह भविष्य है, लेकिन अगर हमने इसकी ‘प्यास’ का प्रबंधन नहीं किया, तो यह भविष्य काफी सूखा हो सकता है। अगली बार जब आप एआई से कोई सवाल पूछें, तो याद रखें कि इसकी कीमत सिर्फ डेटा नहीं, बल्कि पानी की एक बूंद भी है।

