लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में रविवार की शाम एक नई इबारत लिखी गई। योगी सरकार के नौ साल के इतिहास में पहली बार भाजपा की सबसे ताकतवर ‘कोर कमेटी’ की बैठक न तो मुख्यमंत्री आवास में हुई और न ही पार्टी मुख्यालय में — बल्कि उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के सरकारी आवास पर शाम 6 बजे इस बेहद अहम बैठक की मेजबानी हुई। इस एक घटना ने लखनऊ के सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है।
ऐतिहासिक मौका — जो केशव को न मिला, वो ब्रजेश को कैसे मिला?
सियासी हलकों में सबसे बड़ा सवाल यही है। योगी सरकार में वरिष्ठ साझेदार और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को बीते वर्षों में यह अवसर कभी नहीं मिला। हां, 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले सीएम योगी और संघ के पदाधिकारी मौर्य के घर गए थे, लेकिन वह महज ‘भोजन’ का कार्यक्रम था — नीतिगत निर्णयों वाली आधिकारिक कोर कमेटी की बैठक नहीं। इसीलिए ब्रजेश पाठक को मिली यह मेजबानी पार्टी के भीतर बदलते शक्ति समीकरणों का स्पष्ट संकेत मानी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषक इसे भाजपा की उस नई रणनीति के रूप में देख रहे हैं जिसमें पार्टी सत्ता के केंद्र को विकेंद्रीकृत कर ‘सामूहिक नेतृत्व’ का संदेश देना चाहती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह भी मौजूद रहे।
20 मार्च की मैराथन बैठक का अगला चरण
यह बैठक अचानक नहीं हुई। इससे पहले बीते 20 मार्च को सीएम आवास पर साढ़े चार घंटे की लंबी ‘समन्वय बैठक’ हो चुकी थी, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मंत्रियों और विधायकों की कार्यशैली पर गहरी नाराजगी खुलकर जाहिर की थी। संघ ने दो टूक कहा था कि मंत्रियों का अपने ही अनुषांगिक संगठनों से तालमेल लगभग शून्य हो चुका है और विधायकों की विवादित बयानबाजी जनता के बीच गलत संदेश दे रही है। रविवार की बैठक उन्हीं खामियों को दूर करने की दिशा में उठाया गया अगला कदम थी।
एजेंडे में क्या था? — ‘मिशन 2027’ की डेडलाइन
बैठक का एजेंडा पूरी तरह 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी पर केंद्रित रहा। पार्टी ने संघ को यह आश्वासन दिया है कि 30 मार्च तक सभी जिलों की जिला कार्यकारिणी का गठन अनिवार्य रूप से पूरा कर लिया जाएगा। इसके बाद 15 अप्रैल तक नई प्रदेश टीम की घोषणा होगी और 15 मई तक उत्तर प्रदेश के सभी निगमों, आयोगों और बोर्डों में लंबे समय से लंबित राजनीतिक नियुक्तियां पूरी कर दी जाएंगी।
इसके अलावा पंचायत चुनावों को देखते हुए ओबीसी आयोग के गठन पर भी विस्तार से मंथन हुआ। पार्टी ने तय किया कि आने वाले दिनों में जातिगत बयानबाजी से दूरी बनाते हुए ‘राष्ट्रवाद’ को ही मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया जाएगा।
कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करना सबसे बड़ी प्राथमिकता
सूत्रों के मुताबिक, बैठक में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं की नाराजगी को दूर किया जाए। संगठन और सरकार के बीच जो खाई पिछले कुछ समय से महसूस की जा रही है, उसे पाटना भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। 2027 से पहले पार्टी इस खाई को पाटने के लिए ठोस कदम उठाना चाहती है।
बड़े संकेत देती है यह बैठक
कुल मिलाकर यह बैठक उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई बड़े संकेत दे रही है। पहला — ब्रजेश पाठक का कद पार्टी में तेजी से बढ़ रहा है। दूसरा — भाजपा 2027 की तैयारी को लेकर पूरी तरह सतर्क हो चुकी है और संगठन को धार देने में कोई देरी नहीं चाहती। तीसरा — संघ की सक्रिय भूमिका यह बताती है कि आने वाले दिनों में सरकार और संगठन के बीच समन्वय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। लखनऊ के सियासी पंडितों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि इस बैठक के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में जो नई बिसात बिछाई गई है, उसके मोहरे आने वाले हफ्तों में किस दिशा में चलते हैं।
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