UP Voter List Controversy: 1.27 करोड़ हिंदू मतदाताओं के नाम काटने का दावा vs मुस्लिम वोट हटाने के आरोप, जानें क्या है वोटर लिस्ट का पूरा ‘नैरेटिव गेम’

लखनऊ / नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश की सियासत में आगामी चुनाव और प्रशासनिक हलचलों के बीच ‘वोटर लिस्ट में हेरफेर’ और ‘नैरेटिव पॉलिटिक्स’ का मुद्दा चरम पर पहुंच चुका है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक कथित आंकड़े को ढाल बनाकर यह नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और नाम छांटने के अभियान के तहत करीब सवा करोड़ (1.27 करोड़) हिंदू मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं, वहीं दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) और अन्य नेताओं ने इस आंकड़े के स्रोत और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस पूरे विवाद में एफआईआर (FIR), बीएलओ (BLO) पर कार्रवाई, प्रशासन की भूमिका और दोनों तरफ से साधे जा रहे राजनीतिक निशानों ने यूपी के सियासी पारे को गरमा दिया है।

1.27 करोड़ हिंदू वोटों के कटने का दावा: कहां से शुरू हुआ विवाद?

सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि यूपी में मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण और फर्जी मतदाताओं को हटाने की प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हुए हैं।

इस बहस के बीच सीएम योगी आदित्यनाथ के एक वक्तव्य को आधार बनाकर यह नैरेटिव पेश किया गया कि “करीब 1.27 करोड़ हिंदू वोटरों के नाम साक्ष्य या कागजातों के अभाव में लिस्ट से काट दिए गए हैं”। इस नैरेटिव के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि बहुसंख्यक समुदाय के वोट बैंक को नुकसान पहुंचाया जा रहा है और इसी आड़ में दिल्ली बनाम लखनऊ (केंद्रीय नेतृत्व बनाम राज्य नेतृत्व) का एक अनकहा शक्ति-परीक्षण चल रहा है।

अखिलेश यादव का पलटवार: “सीएम बताएं, आंकड़े कहां से आए?”

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस नैरेटिव पर कड़ा रुख अपनाया है। अखिलेश यादव ने सवाल दागा कि:

  • डेटा का स्रोत क्या है? मुख्यमंत्री और सत्ताधारी दल के पास यह आंकड़ा आखिर कहां से आया कि काटे गए 1.27 करोड़ वोट केवल हिंदुओं के ही हैं? चुनाव आयोग की प्रक्रिया में धर्म के आधार पर आंकड़े जारी नहीं होते।
  • फॉर्म-7 का दुरुपयोग: अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि फॉर्म-7 (वोट काटने के आवेदन) का मनमाना इस्तेमाल करके वैध मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिशें की गईं। उन्होंने दावा किया कि सपा कार्यकर्ताओं की सतर्कता के कारण इस तरह के प्रयासों को रोका गया।
  • घुसपैठियों के नाम पर डर: विपक्ष का कहना है कि ‘घुसपैठियों’ और फर्जी वोटरों के नाम पर जनता का ध्यान असल बुनियादी मुद्दों से भटकाया जा रहा है।

मुस्लिम मतदाताओं के नाम काटने और एफआईआर (FIR) का मुद्दा

विपक्ष और विभिन्न स्थानीय रिपोर्टों का यह भी गंभीर आरोप है कि जमीनी स्तर पर प्रशासन और जिला निर्वाचन अधिकारियों द्वारा मुस्लिम मतदाताओं के वोट काटने और उनके नाम-पिता के नाम में हेरफेर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई।

  • पीलीभीत और अन्य जिलों में मामले: हालिया महीनों में पीलीभीत और अन्य सीटों पर वोटर लिस्ट में हजारों नाम बदले जाने या हटाने की शिकायतों के बाद चुनाव आयोग ने संज्ञान लिया था, जहां जांच में लापरवाही पाए जाने पर एसडीएम स्तर के अधिकारियों को हटाया गया और बीएलओ तथा ऑपरेटरों पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए गए।
  • दोनों तरफ से बीएलओ पर गाज: वहीं दूसरी ओर, बरेली जैसे जिलों से भी ऐसे मामले सामने आए जहां बीएलओ द्वारा पक्षपातपूर्ण तरीके से वोट काटने पर निलंबन की कार्रवाई की गई।
  • प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल: विपक्षी दलों का कहना है कि प्रशासनिक तंत्र चुनाव आयोग के निर्देशों की आड़ में एक खास वर्ग के मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने में लगा हुआ है।

क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक नैरेटिव है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव की आहट के साथ ही दोनों तरफ से ‘नैरेटिव बिल्डिंग’ (आख्यान निर्माण) का खेल खेला जा रहा है:

  1. ध्यान भटकाने की रणनीति: सवा करोड़ हिंदू वोटों का मुद्दा उठाकर आम जनता के सामने एक विशिष्ट विमर्श पेश किया जा रहा है, ताकि बेरोजगारी, महंगाई और प्रशासनिक विफलताओं जैसे जमीनी मुद्दों से ध्यान दूसरी तरफ मोड़ा जा सके।
  2. वोट बैंक का ध्रुवीकरण: हिंदू वोटरों के कटने की खबर से बहुसंख्यक वर्ग में रक्षात्मक लामबंदी की कोशिश की जा रही है, जबकि मुस्लिम वोटर्स को हटाए जाने के आरोपों के जरिए विपक्ष अपने कोर ‘पीडीए’ (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक) आधार को सतर्क और एकजुट कर रहा है।
  3. दिल्ली बनाम लखनऊ का नैरेटिव: इस विवाद के पीछे एक राजनीतिक एंगल यह भी दिया जा रहा है कि एफआईआर और प्रशासनिक कार्रवाइयों के बहाने सीएम योगी के नेतृत्व और उनकी प्रशासनिक पकड़ को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, ताकि ‘तीसरी बार यूपी फतह’ के रास्ते में रुकावटें पैदा की जा सकें।

परिणाम क्या होंगे?

चुनावी गणित के हिसाब से यदि मतदाता सूची से वास्तव में लाखों नाम बाहर होते हैं, तो इसका सीधा असर विधानसभा की 403 सीटों के समीकरण पर पड़ना तय है। हालांकि, जब ईवीएम (EVM) खुलेगी और विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आएंगे, तभी साफ हो पाएगा कि जनता ने इस ‘नैरेटिव वॉर’ को किस रूप में स्वीकार किया है।फिलहाल, चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन पर मतदाता सूचियों की पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने का भारी दबाव है।

 

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