नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापार समझौते की वार्ता अब ‘पठार’ (plateau) पर पहुंच गई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को स्पष्ट कहा कि दोनों पक्षों के लिए अब और रियायतें देना या लेना “बहुत-बहुत मुश्किल” हो गया है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि टैरिफ अब महज बातचीत का औजार नहीं रह गए हैं, बल्कि उन्हें ‘हथियार’ बना दिया गया है।
सीतारमण म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस (म्यूनिख लीडर्स मीटिंग) के न्यू दिल्ली सत्र में बोल रही थीं। उन्होंने कहा, “यह एक कठिन और बहुत सख्ती से बातचीत वाला समझौता रहा है। वार्ता अभी भी जारी है, हालांकि हम मानना चाहेंगे कि दोनों पक्ष एक ऐसे पठार पर पहुंच गए हैं, जहां से आगे देना या लेना बहुत-बहुत मुश्किल हो सकता है। लेकिन अगर कुछ जगह बची है, तो दोनों पक्ष उस पर काम करेंगे।”
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले सप्ताह अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर ने भारतीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात के बाद कहा था कि समझौता “आसन्न” (imminent) नहीं है, हालांकि दोनों पक्ष “शॉर्ट स्ट्रोक्स” यानी अंतिम चरण में हैं।
व्यापार असंतुलन और टैरिफ का मुद्दा
सीतारमण ने साफ कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है और घाटा अमेरिका का है। अमेरिका इस असंतुलन को कम करना चाहता है। उन्होंने चीन के साथ भारत के बड़े व्यापार घाटे का जिक्र करते हुए कहा कि असंतुलन को सिर्फ टैरिफ से नहीं, बल्कि बातचीत और “देने-लेने” से सुलझाना चाहिए। “मैं चीन के साथ भी यही रुख अपना सकती हूं, लेकिन नहीं। बातचीत करनी पड़ती है,” उन्होंने कहा।
वित्त मंत्री ने टैरिफ के “वेपनाइज्ड” होने की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पहले टैरिफ बातचीत का एक साधन था और उसका एक ढांचा होता था। अब असंतुलन को बातचीत के अलावा दूसरे तरीकों से दूर करने की कोशिश हो रही है, जिसमें टैरिफ को हथियार बना दिया गया है।
रूसी तेल और अमेरिकी कानून का दबाव
समझौते की गुंजाइश इसलिए और संकरी हो गई है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कांग्रेस बिल पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, जो रूसी तेल खरीदने वाले देशों (भारत और चीन समेत) पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और रूसी तेल का बड़ा खरीदार बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत रूसी तेल खरीद घटाता है तो घरेलू ईंधन कीमतें बढ़ सकती हैं या सरकारी खजाने पर दबाव पड़ेगा। अगर खरीद जारी रखता है तो अमेरिका को निर्यात प्रभावित हो सकता है। भारत पहले ही चेतावनी दे चुका है कि अमेरिकी उपाय द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
व्यापार आंकड़े और पृष्ठभूमि
अप्रैल-अगस्त 2026 में भारत से अमेरिका को माल निर्यात 42.79 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल की इसी अवधि के 40.39 अरब डॉलर से ज्यादा है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। दोनों देश फरवरी 2025 से व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। फरवरी 2026 में एक अंतरिम ढांचा समझौता हुआ था, जिसके तहत टैरिफ कम करने और बाजार पहुंच बढ़ाने की दिशा में काम करने पर सहमति बनी थी, लेकिन अंतिम समझौता अभी तक नहीं हो पाया है।
विश्लेषक मानते हैं कि भारत अब और रियायतें देने से बच रहा है, जबकि अमेरिका और रियायतें चाहता है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि समझौता अधूरा रहते हुए भारत को और रियायतें नहीं देनी चाहिए।
सीतारमण के बयान से साफ है कि दोनों पक्षों के बीच अभी भी कुछ मुद्दे अनसुलझे हैं—खासकर बाजार पहुंच, कृषि क्षेत्र की सुरक्षा, टैरिफ दरों में तुलनात्मक लाभ और रूसी तेल से जुड़ी संभावित सजा। वार्ता जारी है, लेकिन फिलहाल कोई बड़ा ब्रेकथ्रू आसपास नजर नहीं आ रहा।

