‘बेटी बचाओ’ से आगे, दिल्ली सचिवालय के बाहर छात्राओं का प्रदर्शन

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली की सड़कें एक बार फिर महिलाओं की सुरक्षा और आजादी की आवाज से गूंज उठीं। नॉर्थ कैंपस की गलियों से लेकर भारी सुरक्षा घेरे वाले दिल्ली सचिवालय तक छात्राओं और युवा महिलाओं ने प्रदर्शन किया। बुधवार को सचिवालय के बाहर जमा हुई भीड़ ने प्लेकार्ड और नारों के जरिए सवाल उठाया—क्या महिलाएं सिर्फ सुरक्षित रहने के लिए अपनी जिंदगी बदलें?

“बीटा पढ़ाओ, बेटी बचाओ।”
“मैं नंगी पैदा हुई हूं। विकृत तुम हो।”
“हमारी आजादी से जिसे दर्द है, वह सब नामर्द है।”

ये नारे और हैंडराइटेन प्लेकार्ड बुधवार को दिल्ली सचिवालय के बाहर दिखे। दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और अन्य कॉलेजों की छात्राएं वहां पहुंचीं। मांगें कागजों पर बहुत बुनियादी लगती हैं—सुरक्षा, गरिमा और शहर में बिना खतरे के घूमने की आजादी। लेकिन बैरिकेड और भारी पुलिस बल के बीच प्रदर्शन का मकसद साफ था: सुरक्षा का बोझ पीड़ित पर न डाला जाए। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि कपड़े बदलना, अंधेरा होने से पहले घर लौटना, पार्क से बचना या पुरुष दोस्तों से मिलना बंद करना समाधान नहीं है। “क्या हम ऐसे देश में इसकी कल्पना कर सकते हैं जहां लड़कियों को देवी कहा जाता है?” एक दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आरवी ने कहा।

क्या कहती हैं आंकड़े?
एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ 13,366 मामले दर्ज हुए। रेप के मामले 1,088 बताए गए, जबकि दिल्ली पुलिस के आंकड़ों में रेप के 2,141 मामले हैं। आंकड़ों से ज्यादा छात्राएं रोजमर्रा की परेशानियों—पीछा करना, अश्लील टिप्पणी, घूरना—की बात कर रही हैं।

आस्था कुंज मामले ने बढ़ाया गुस्सा
प्रदर्शनों की शुरुआत सितंबर 21 को दक्षिण दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित गैंगरेप के बाद हुई। तीन आरोपी पुलिस के वेश में थे। आरोपियों को जल्द गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों—मिरांडा हाउस, लेडी श्री राम, गर्गी, कमला नेहरू आदि—में मार्च निकले। सितंबर 28-29 को नॉर्थ कैंपस में बड़े प्रदर्शन हुए। बुधवार को सचिवालय के बाहर छात्रों ने अपनी मांगें मुख्यमंत्री कार्यालय को सौंपीं। बैरिकेड, वॉटर कैनन और अतिरिक्त पुलिस बल तैनात था। एक पुलिसकर्मी ने कहा, “प्रदर्शन जल्द खत्म हो जाएगा। मांगें जमा हो चुकी हैं।”

मांगें क्या हैं?
बेहतर स्ट्रीट लाइटिंग, अधिक बसें, सुरक्षित सार्वजनिक शौचालय, सीसीटीवी, पार्क और कॉलेज के आसपास गश्त, एफआईआर में देरी न होना और महिलाओं पर प्रतिबंध लगाने की बजाय अपराधियों पर कार्रवाई। कई छात्र पहली बार प्रदर्शन में शामिल हुए थे। नॉर्थ कैंपस में भी हालात सामान्य दिखे, लेकिन कई छात्राओं ने कैंपस के आसपास उत्पीड़न की शिकायत की। कुछ ने कॉलेजों में कपड़ों पर पाबंदी की बात भी कही। पुरुष छात्र भी समर्थन में आए।

एक जेएनयू छात्रा दीक्षा ने कहा, “इतनी पुलिस हमें रोकने के लिए लगाई गई है। अगर इतनी तैयारी अपराध रोकने के लिए होती तो सड़क पर आने की जरूरत ही न पड़ती।” प्रदर्शनकारियों का साफ संदेश है—सुरक्षा का मतलब महिलाओं की आजादी पर अंकुश नहीं होना चाहिए। वे पूछ रही हैं: लड़की को सावधानी सिखाने से पहले लड़के को सहमति क्यों नहीं सिखाई जाती?

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