लीन आउट ट्रेंड, महिलाओं की महत्वाकांक्षा कम नहीं हुई, कंपनियां ही उन्हें बाहर धकेल रही

एक दशक से अधिक समय तक महिलाओं को एक ही सलाह दी जाती रही—‘लीन इन’ करो, मुखर होकर बोलो, अधिक मांगो, प्रमोशन स्वीकार करो और खुद को कमतर मत आंको। यह अवधारणा फेसबुक (अब मेटा) की पूर्व सीओओ शेरिल सैंडबर्ग की 2013 की बेस्टसेलर किताब ‘लीन इन’ से दुनिया भर में लोकप्रिय हुई। सैंडबर्ग का सीधा संदेश था—आपका करियर आपके हाथ में है, पूरी तरह कूद पड़ो और उसका सबसे बेहतर उपयोग करो। लाखों महिलाओं के लिए यह एक आंदोलन बन गया। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। महिलाएं करियर की सीढ़ी चढ़ तो रही हैं, पर शिखर तक पहुंचने की इच्छा कम होती दिख रही है। सवाल उठ रहा है—क्या महिलाओं ने अचानक महत्वाकांक्षा खो दी? या वे ‘लीन आउट’ कर रही हैं?

ताजा आंकड़े क्या कहते हैं

मैकिन्से एंड कंपनी और लीनइन.ऑर्ग की संयुक्त रिपोर्ट ‘वुमेन इन द वर्कप्लेस 2025’ (11वीं वार्षिक रिपोर्ट) ने पहली बार एक मापने योग्य महत्वाकांक्षा अंतराल (ambition gap) दर्ज किया है। रिपोर्ट के अनुसार, 86 प्रतिशत पुरुष अगला प्रमोशन चाहते हैं, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 80 प्रतिशत है। अंतर प्रवेश स्तर पर और भी साफ है—69 प्रतिशत एंट्री-लेवल महिलाएं बनाम 80 प्रतिशत पुरुष। सीनियर स्तर पर भी महिलाएं 84 प्रतिशत प्रमोशन चाहती हैं, जबकि पुरुष 92 प्रतिशत।

रिपोर्ट साफ कहती है कि महिलाएं और पुरुष दोनों अपने करियर के प्रति समान रूप से प्रतिबद्ध और प्रेरित हैं। अंतर तब कम हो जाता है या गायब हो जाता है जब महिलाओं को पुरुषों के बराबर करियर सपोर्ट—स्पॉन्सरशिप, मैनेजर की वकालत, स्ट्रेच असाइनमेंट और लीडरशिप ट्रेनिंग—मिलता है। समस्या यह है कि महिलाओं को यह समर्थन कम मिल रहा है। एंट्री-लेवल पर सिर्फ 31 प्रतिशत महिलाओं के पास स्पॉन्सर हैं, जबकि पुरुषों में 45 प्रतिशत।

‘ब्रोकेन रंग’ (पहला प्रबंधकीय प्रमोशन) अभी भी टूटा हुआ है। हर 100 पुरुषों के प्रमोशन पर सिर्फ 93 महिलाओं को प्रबंधक बनाया जाता है। रंग की महिलाओं के लिए यह आंकड़ा और कम है। नतीजतन, प्रबंधकीय स्तर पर पुरुष महिलाओं से काफी आगे निकल जाते हैं और सीढ़ी के ऊपरी पायदानों पर पकड़ बनाना मुश्किल हो जाता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2026 के अनुसार, प्रवेश स्तर पर महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 46 प्रतिशत है, लेकिन सी-सूट (शीर्ष नेतृत्व) पर यह घटकर करीब 23 प्रतिशत रह जाती है। महिलाओं का सीईओ पदों पर हिस्सा सिर्फ 19.1 प्रतिशत है। वैश्विक स्तर पर जेंडर गैप 69.2 प्रतिशत बंद हो चुका है, लेकिन पूर्ण समानता अभी भी करीब 120 साल दूर है। नेतृत्व में प्रगति ठहर सी गई है।

घर और दफ्तर का दोहरा बोझ

पांच में से एक महिला प्रमोशन नहीं चाहती। वजह मुख्य रूप से घरेलू और व्यक्तिगत जिम्मेदारियां हैं। महिलाएं आज भी घर का अधिकांश काम संभालती हैं—घरेलू काम, बच्चों की देखभाल और बढ़ती उम्र के माता-पिता की देखभाल। प्रमोशन का मतलब अक्सर अधिक घंटे, अधिक यात्राएं, अधिक बैठकें और अधिक मानसिक दबाव होता है। जब घर लौटकर भी वही जिम्मेदारियां इंतजार कर रही हों, तो कई महिलाएं पूछती हैं—‘क्या मैं यह कर सकती हूं?’ नहीं, बल्कि ‘मुझे यह क्यों करना चाहिए?’ आधुनिक कार्यस्थल अभी भी पुरानी धारणा पर टिका है कि घर संभालने वाला कोई और है। पीढ़ियों तक वह ‘कोई और’ महिला ही होती थी। अब जब महिलाएं ऑफिस जा रही हैं, तो दफ्तर खुद को पूरी तरह उनकी स्थिति के हिसाब से नहीं ढाल पाए हैं। कई कंपनियों ने हाल के वर्षों में रिमोट/हाइब्रिड वर्क विकल्प और फ्लेक्सिबल आवर्स कम कर दिए हैं, जिससे दबाव और बढ़ा है।

सैंडबर्ग का अपना अहसास

खुद शेरिल सैंडबर्ग ने हाल ही में स्वीकार किया है कि महिलाएं महत्वाकांक्षा नहीं खो रही हैं। कंपनियां उन्हें बाहर धकेल रही हैं। उन्होंने कहा कि यह एक असहज निष्कर्ष है, लेकिन आज की हकीकत यही है। जब महिलाओं को समान अवसर और समर्थन मिलता है तो महत्वाकांक्षा का अंतर गायब हो जाता है। समस्या यह है कि कई कंपनियां महिलाओं के करियर एडवांसमेंट को अब उच्च प्राथमिकता नहीं दे रही हैं। सिर्फ आधी कंपनियां इसे प्राथमिकता मानती हैं, जबकि कुछ साल पहले यह आंकड़ा कहीं अधिक था। ‘लीन इन’ दर्शन की सबसे बड़ी आलोचना यही रही है कि इसने महिलाओं से अधिक महत्वाकांक्षी बनने को कहा, लेकिन व्यवस्था की जिम्मेदारी पर पर्याप्त जोर नहीं दिया। सदियों से महिलाओं को बताया जाता रहा कि पुरुष जैसा करियर बना सकती हो, बस मांगो और आगे बढ़ो। व्यावहारिक रूप से यह जटिल साबित हुआ क्योंकि कार्यस्थल ने खुद को नहीं बदला।

आगे का रास्ता

केवल महत्वाकांक्षा के दम पर टूटे हुए प्रमोशन पाइपलाइन को ठीक नहीं किया जा सकता। महिलाओं से ‘लीन इन’ कहने के बजाय अब सवाल यह होना चाहिए—कार्यस्थल कब महिलाओं की जरूरतों के अनुसार झुकेगा? कंपनियों को स्पॉन्सरशिप प्रोग्राम मजबूत करने, मैनेजरों की जवाबदेही तय करने, फ्लेक्सिबल वर्क विकल्प बनाए रखने और करियर विकास के अवसर समान रूप से देने होंगे। रिपोर्ट के अनुसार, जो कंपनियां जेंडर डाइवर्सिटी को प्राथमिकता देती हैं, वे बेहतर नतीजे हासिल करती हैं। 2026 को फिर से प्रतिबद्धता का साल बनाने की सलाह दी जा रही है। अन्यथा पिछले एक दशक की प्रगति पलट सकती है। महिलाएं महत्वाकांक्षा नहीं खो रही हैं। वे सिर्फ उस व्यवस्था से सवाल पूछ रही हैं जो उनके लिए नहीं बनी थी। अब बारी कार्यस्थल की है कि वह कितना ‘लीन इन’ करता है।

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