‘येशनगुला’ ग्लोबल हिट: ‘येशनगुला’ ने मचाई धूम, फिर भी तेलंगाना तेलुगु क्यों बनती है मज़ाक का विषय? जानें पूरा विवाद

तेलंगाना का लोकसंगीत इन दिनों तेलुगु पॉप कल्चर के केंद्र में है, लेकिन इसकी बढ़ती लोकप्रियता के साथ ही सोशल मीडिया पर एक पुराना विवाद फिर से सिर उठा रहा है। गायक रामू राठौड़ और प्रभा का स्वतंत्र लोकगीत “रानू बॉम्बे की रानू” यूट्यूब पर लगभग 90 करोड़ व्यूज़ की ओर बढ़ रहा है, वहीं संगीतकार अनिरुद्ध रविचंदर ने डलास में नानी को मंच पर बुलाकर फिल्म ‘द पैराडाइज़’ के दूसरे गाने “येशनगुला” को लॉन्च किया। निर्देशक श्रीकांत ओडेला की इस पीरियड एक्शन ड्रामा फिल्म का यह गाना रिलीज़ के एक दिन के भीतर ही 3 करोड़ व्यूज़ पार कर गया और अब तक 4.6 करोड़ से ज़्यादा व्यूज़ हासिल कर चुका है। यह गाना यूट्यूब म्यूज़िक के भारत ट्रेंडिंग चार्ट में भी शीर्ष पर पहुंच गया।

सफलता के साथ ट्रोलिंग भी शुरू

हालांकि, इस सफलता के साथ ही एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर कुछ यूज़र्स गाने की भाषा को समझ न पाने की शिकायत करते नज़र आए, कुछ ने इसे भोजपुरी गानों से जोड़कर तंज कसा, तो कुछ ने दावा किया कि तेलंगाना लोकसंगीत की अपनी कोई पहचान नहीं है और यह पूरी तरह आंध्र प्रभाव पर निर्भर है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह पैटर्न फिल्म के पहले गाने “आया शेर” के समय भी देखा गया था। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यह विवाद आंध्र बनाम तेलंगाना नहीं है, क्योंकि आंध्र, केरल, तमिलनाडु और हिंदी भाषी राज्यों के भी कई लोग इस गाने पर थिरक रहे हैं। ट्रोलिंग एक छोटे लेकिन मुखर तबके की ओर से हो रही है।

डबिंग ट्रेंड और पुरानी रूढ़ियां

रिपोर्ट के अनुसार, “येशनगुला” की रिलीज़ के बाद निर्देशक एस.एस. राजामौली की फिल्मों “बाहुबली” और “मगधीरा” के दृश्यों पर तेलंगाना बोली में मज़ाकिया डबिंग करने का चलन भी फिर तेज़ हो गया है। रिपोर्ट में इसे एक गहरी सामाजिक सोच का संकेत बताया गया है — यह बोली किसी मज़दूर या खलनायक के मुंह में तो स्वाभाविक लगती है, लेकिन जब यही भाषा किसी राजा या योद्धा के मुंह में डाली जाती है, तो उसे कॉमेडी बना दिया जाता है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सत्य प्रकाश एलावर्ती और शोधकर्ता वंशी वेमीरेड्डी के शोधपत्र “तेलंगाना एंड लैंग्वेज पॉलिटिक्स ऑफ तेलुगु सिनेमा” का हवाला देते हुए रिपोर्ट बताती है कि तेलुगु सिनेमा में दशकों तक तेलंगाना बोली का इस्तेमाल हास्य या खलनायकी किरदारों के लिए किया जाता रहा है। इसके उदाहरण के तौर पर 1989 की फिल्म “जयम्मू निश्चयम्मू रा” और 1992 की फिल्म “मोंडी मोगुडु पेंकी पेल्लम” का ज़िक्र किया गया है, जहां तेलंगाना बोली का इस्तेमाल सिर्फ हंसी उड़ाने के लिए हुआ।

पहनावे पर भी वही पुरानी सोच

रिपोर्ट में फिल्म में नानी के किरदार ‘जादल’ की स्टाइलिंग — लंबी चोटी, भारी दाढ़ी, चमकीली शर्ट और सोने की चेन — पर भी चर्चा की गई है। कुछ दर्शकों ने इसे “अनकल्चर्ड” बताते हुए तंज कसा, जबकि रिपोर्ट इसे समाजशास्त्री थॉर्स्टीन वेब्लेन की “कॉन्स्पिक्युअस कंजम्पशन” की अवधारणा से जोड़ती है — यानी जिन समुदायों को नज़रअंदाज़ किया जाता है, वे अक्सर दिखावटी पहनावे के ज़रिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। रिपोर्ट में इसकी तुलना अभिनेता अल्लू अर्जुन के “पुष्पा” किरदार से भी की गई है।

बदलाव की बयार भी शुरू

रिपोर्ट के मुताबिक, बीते एक दशक में शेखर कम्मुला, संदीप रेड्डी वांगा, श्रीकांत ओडेला, वेणु येलंडी और तरुण भास्कर जैसे तेलंगाना मूल के निर्देशकों ने इस बोली को मुख्यधारा की फिल्मों में भावनात्मक और नायकत्व का केंद्र बना दिया है। अभिनेता विजय देवरकोंडा ने 2024 में टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि करियर की शुरुआत में उन्हें तेलंगाना लहजा न बोलने की सलाह दी गई थी, लेकिन अब यही लहजा उनकी पहचान बन चुका है।

निष्कर्ष

रिपोर्ट के अनुसार, “डीजे टिल्लू”, “दसरा” और “बालागाम” जैसी फिल्मों ने साबित कर दिया है कि तेलंगाना बोली कोई कमी नहीं बल्कि एक ताकत है। यूट्यूब रिकॉर्ड तोड़ने और म्यूज़िक चार्ट में टॉप करने के बावजूद तेलंगाना तेलुगु को अब भी अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए मजबूर होना पड़ता है — जो दिखाता है कि पुराना सांस्कृतिक पदानुक्रम अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

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