Operation Economic Outcast: अमेरिका ने क्यों लगाए 4 भारतीय कंपनियों पर प्रतिबंध? जानिए मुख्य कारण

Operation Economic Outcast: नई दिल्ली/वाशिंगटन, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल व्यापार से जुड़े आरोपों में भारत स्थित चार कंपनियों तथा तीन भारतीय नागरिकों पर ताजा प्रतिबंध लगा दिए हैं। यह कार्रवाई ट्रंप प्रशासन के नए अभियान ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ का हिस्सा है, जिसका मकसद ईरान की राजस्व धाराओं को काटना बताया जा रहा है।

अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट और ट्रेजरी विभाग के अनुसार, 24 अगस्त 2026 को घोषित इन प्रतिबंधों में शामिल कंपनियां हैं—सदाशिवा ओवरसीज लिमिटेड, पीपी सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड, प्रकृतीस इंफ्रा इंपेक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और पोर्टईज पार्टनर्स एलएलपी। साथ ही तीन भारतीय नागरिकों—प्रशांत गर्ग (पीपी सॉफ्टटेक के निदेशक), इंद्रिस्मिया अशरफमिया शेख और हरीश रामचंद्र रंगी (पोर्टईज पार्टनर्स के पार्टनर)—को भी सूची में शामिल किया गया है।

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, सदाशिवा ओवरसीज ने फरवरी 2024 से जून 2025 के बीच करीब 69 मिलियन डॉलर मूल्य के ईरानी मूल के पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए। इनमें से कुछ आपूर्ति पहले से प्रतिबंधित कंपनी बोनजोर कमोडिटी एफजेडई से जुड़ी बताई गई है। पीपी सॉफ्टटेक और प्रकृतीस इंफ्रा इंपेक्स ने क्रमशः जनवरी 2024-जून 2025 तथा मई 2023-फरवरी 2026 के दौरान करीब 25-25 मिलियन डॉलर मूल्य के ईरानी पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए। तीनों कंपनियों के कुल लेन-देन को लगभग 119 मिलियन डॉलर आंका गया है।

चौथी कंपनी पोर्टईज पार्टनर्स एलएलपी एक कस्टम ब्रोकर है। अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट का आरोप है कि इसने भारत में ईरानी पेट्रोकेमिकल उत्पादों के कई शिपमेंट की सुविधा प्रदान की। इसके दो पार्टनरों को भी अलग से प्रतिबंधित किया गया है। इन कंपनियों और व्यक्तियों को “ईरान से पेट्रोलियम या पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद, अधिग्रहण, बिक्री, परिवहन या विपणन से जुड़े महत्वपूर्ण लेन-देन में जानबूझकर संलग्न होने” के आधार पर प्रतिबंध सूची में डाला गया है।

‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ क्या है?
 अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने इस अभियान की घोषणा करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य ईरान की वैश्विक वित्तीय कड़ियों को तोड़ना और उसके तेल-पेट्रोकेमिकल राजस्व, शिपिंग, बैंकिंग तथा अन्य स्रोतों को रोकना है। स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता ने इसे ईरानी शासन की “अस्थिरकारी गतिविधियों” को निशाना बनाने वाली व्यापक कार्रवाई बताया, जिसमें ऊर्जा उत्पादों की बिक्री शामिल है जिनसे आतंकवाद को फंडिंग मिलती है।

यह कार्रवाई उस पृष्ठभूमि में आई है जब अमेरिका ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए माध्यमिक प्रतिबंधों का दायरा बढ़ा रहा है। भारत के लिए यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि पहले भी भारतीय कंपनियों और व्यक्तियों पर ईरान से जुड़े तेल व्यापार के आरोप में प्रतिबंध लग चुके हैं। हालांकि, आधिकारिक रूप से भारत सरकार की तरफ से अभी विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि छोटी और मझोली कंपनियां जो ईरानी मूल के उत्पादों में लेन-देन करती हैं, उन्हें अब अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी।

ईरान के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार पिछले वर्षों में काफी कम हो चुका है। तेल आयात पर पहले से प्रतिबंधों का प्रभाव रहा है, लेकिन पेट्रोकेमिकल और संबंधित उत्पादों में कुछ लेन-देन जारी रहने के आरोप अमेरिका लगाता रहा है। इस नई सूची से भारतीय व्यवसायों के लिए अनुपालन का जोखिम और बढ़ गया है। कुल मिलाकर, वाशिंगटन का संदेश साफ है—ईरान के साथ कारोबार न केवल तेहरान के लिए बल्कि बिचौलियों, आयातकों और दलालों के लिए भी महंगा पड़ सकता है। ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ के तहत आगे और कार्रवाइयों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
यह भी पढ़ें: Chhatrapati Sambhajinagar Khavda Hill accident: iPhone की कहानी निकली झूठी, पारिवारिक विवाद बना 3 मौतों की वजह

यहां से शेयर करें