Packaged Food Warning Labels: भारत सरकार और पैकेज्ड फूड कंपनियों के बीच क्यों छिड़ी है बहस?

Packaged Food Warning Labels: नई दिल्ली/लंदन। भारत के खाद्य सुरक्षा नियामक (FSSAI) ने पैकेज्ड फूड और पेय पदार्थों पर रंगीन चेतावनी लेबल लगाने की योजना को फिलहाल टाल दिया है। यह फैसला बड़ी खाद्य कंपनियों के भारी विरोध के बाद आया, जिसकी वजह से यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है।

मामला क्या है?

भारत में बिकने वाले पैकेज्ड फूड उत्पादों में चीनी, नमक और वसा की मात्रा अक्सर उनके विदेशी संस्करणों से कहीं अधिक होती है। उदाहरण के तौर पर, लंदन में बिकने वाले फैंटा के एक कैन में जितनी कैलोरी होती है, भारत में बिकने वाले उसी ब्रांड में उससे तीन गुना अधिक चीनी पाई जाती है। इसमें इस्तेमाल होने वाला आर्टिफिशियल रंग यूरोप में होता तो पैकेट के आगे स्पष्ट चेतावनी छापनी पड़ती, लेकिन भारत में इसका ज़िक्र केवल पीछे छोटे अक्षरों में होता है। 2017 से भारतीय नियामक रंग-कोडित चेतावनी और स्टार रेटिंग जैसी व्यवस्थाएं लाने पर विचार करता रहा है, ताकि उपभोक्ताओं को यह आसानी से पता चल सके कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या वसा कितनी मात्रा में है। इसके लिए इज़राइल जैसे देशों के लाल-हरे चेतावनी मॉडल का हवाला भी दिया गया, जिसे दुनियाभर के करीब 20 देशों ने अपनाया है।

मार्च की बैठक में उद्योग जगत का विरोध

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च में हुई एक बैठक में उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने नियामक अधिकारियों के सामने कड़ा विरोध जताया। कोका-कोला इंडिया की एक वरिष्ठ अधिकारी ने तर्क दिया कि केवल पैकेट पर एक चिन्ह या आइकॉन देखकर उपभोक्ताओं की खान-पान की आदतें नहीं बदलेंगी, क्योंकि भारतीय डॉक्टर पहले ही मरीजों को उचित सलाह दे रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि कोका-कोला की यूरोपीय शाखा और नेस्ले जैसी कंपनियां यूरोप और ब्रिटेन में स्वेच्छा से ऐसे ट्रैफिक-लाइट स्टाइल लेबल इस्तेमाल करती हैं।

इंडिया फूड एंड बेवरेज एसोसिएशन, जो पेप्सिको जैसी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करती है, ने कहा कि यदि रंग-कोडित लेबल अनिवार्य हुए तो लगभग 80% पैकेज्ड फूड उत्पाद “लाल” श्रेणी में आ जाएंगे, क्योंकि उद्योग के अनुमान के अनुसार भारत के अधिकांश उत्पादों में चीनी, नमक या वसा की मात्रा अधिक है। इस दबाव के बाद FSSAI ने अगस्त में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाना “मुश्किल” है, और इसके बजाय पैकेट के पीछे काले-सफेद रंग में पोषण तालिका देने का प्रस्ताव रखा। इस पर अदालत ने नियामक को फटकार लगाते हुए कहा कि दुनिया को यह पता होना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर गंभीर है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता

द जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ की विशेषज्ञ सिमोन पेटिग्रू के अनुसार, कंपनियों का मुनाफा दांव पर होने की वजह से उद्योग जगत जानबूझकर देरी की रणनीति अपनाता है, ताकि उपभोक्ताओं को उत्पादों की वास्तविक सेहत-संबंधी जानकारी से दूर रखा जा सके। लैंसेट पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 2050 तक भारत में करीब 45 करोड़ लोग मोटापे या अधिक वजन से जूझ सकते हैं।

सोशल मीडिया एक्टिविस्टों की भूमिका

“फूड फार्मर” के नाम से मशहूर यूट्यूबर रेवंत हिमतसिंगका जैसे इन्फ्लुएंसर लगातार पैकेज्ड फूड कंपनियों की सामग्री को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने भारत में बिकने वाले नेस्ले किटकैट और मैगी नूडल्स की तुलना विदेशी संस्करणों से करते हुए दिखाया कि भारतीय किटकैट में कोको की मात्रा यूरोपीय संस्करण से काफी कम है, जबकि मैगी में सस्ता पाम ऑयल इस्तेमाल होता है जबकि ब्रिटेन में बिकने वाले संस्करणों में सूरजमुखी तेल का इस्तेमाल होता है भले ही वे भारत में ही बनते हों। 2023 में पेप्सिको के एनर्जी ड्रिंक “स्टिंग” को लेकर बनाए गए एक वीडियो के चलते हिमतसिंगका को दिल्ली की अदालत से टेकडाउन ऑर्डर का सामना भी करना पड़ा था।

बदलाव के संकेत भी

दबाव के बीच कुछ बदलाव भी दिखे हैं। नेस्ले ने 2024 में भारत में शुगर-फ्री सेरेलेक लॉन्च करने की घोषणा की, जबकि कंपनी दशकों से यह विकल्प अन्य देशों में उपलब्ध कराती रही है। इसके अलावा, जुलाई में नियामकों ने पेप्सिको और अन्य कंपनियों को 90 दिनों के भीतर अपने पेय पदार्थों से “एनर्जी ड्रिंक” लेबल हटाने का आदेश भी दिया। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की निगाहें अब अदालत के अगले फैसले पर टिकी हैं। कोका-कोला और नेस्ले ने इस रिपोर्ट पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। पेप्सिको ने भी सवालों का जवाब नहीं दिया। FSSAI ने अदालत में लंबित मामले का हवाला देते हुए टिप्पणी नहीं की।

यह भी पढ़ें: Haiwaan Trailer Out: अक्षय कुमार बने खूंखार हैवान, नेत्रहीन सैफ अली खान से होगी भिड़ंत; विग्नेश शिवन का मजेदार तंज

यहां से शेयर करें