नेपाल में ‘बालेन युग’ की धमाकेदार शुरुआत: नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेंद्र (बालेन) शाह ने सत्ता संभालने के महज 72 घंटों में ऐसे कदम उठाए हैं जिन्होंने पूरे देश की राजनीति को हिला कर रख दिया है। रैपर से राजनेता बने 35 वर्षीय बालेन शाह 27 मार्च 2026 को नेपाल के 47वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद पहले कैबिनेट बैठक से ही बड़े बदलावों की बयार बहा दी है।
छात्र राजनीति पर बैन — युवाओं में उत्साह, राजनीतिक दलों में हड़कंप
बालेन सरकार ने अपनी 100-दिवसीय कार्ययोजना में सबसे बड़ा फैसला यह लिया कि स्कूलों और कॉलेजों से राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठनों को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित कर दिया गया। 90 दिनों के भीतर इन्हें “स्टूडेंट काउंसिल” से बदला जाएगा।
लेकिन यह फैसला बेरोकटोक नहीं गया। छात्र संगठनों ने इसे “विचारधारा पर प्रतिबंध” करार देते हुए विरोध की चेतावनी दी। नेपाली कांग्रेस की छात्र शाखा के नेता सापकोटा ने कहा, “संविधान के तहत विचारधारा रखना और छात्रों के कल्याण के लिए काम करना मौलिक अधिकार है। राजा महेंद्र भी इसे नहीं रोक सके थे।” JSP नेपाल के छात्र संगठन अध्यक्ष मनीष यादव ने तो यहाँ तक कह दिया कि “यदि छात्र संगठन भंग होने हैं तो RSP को भी भंग होना चाहिए।” वहीं आम छात्रों और Gen-Z युवाओं ने इस फैसले का जोरदार स्वागत किया। सोशल मीडिया पर #BanStudentPolitics ट्रेंड करने लगा और लाखों युवाओं ने इसे “कैंपस को राजनीति के चंगुल से मुक्ति” बताया।
पूर्व PM ओली गिरफ्तार — ‘न्याय की शुरुआत’ या ‘राजनीतिक बदला’?
बालेन के शपथ लेने के ठीक एक दिन बाद, 28 मार्च को पूर्व प्रधानमंत्री KP शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को उनके भक्तपुर स्थित आवास से गिरफ्तार कर लिया गया। यह गिरफ्तारी सितंबर 2025 के Gen-Z आंदोलन में छात्रों की पुलिस गोलीबारी में हुई मौतों से जुड़े मामले में हुई। गृह मंत्री सुदान गुरुंग ने X पर लिखा, “वादा वादा होता है, कोई कानून से ऊपर नहीं है। यह किसी से बदला नहीं है, यह न्याय की शुरुआत है।” दूसरी तरफ, ओली की पार्टी CPN-UML ने इसे “बेबुनियाद राजनीतिक प्रतिशोध” करार देते हुए आपातकालीन बैठक बुलाई और सड़क पर उतरने की चेतावनी दी।
भारत से गर्मजोशी, पर कई सवाल भी
PM मोदी ने बालेन शाह और RSP अध्यक्ष रबी लामिछाने से फोन पर बातचीत करते हुए भारत-नेपाल संबंधों को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का भरोसा दिलाया। यह तेज़ कूटनीतिक पहल खुद में एक संकेत है। व्यापार विशेषज्ञ KC सुनील ने कहा कि RSP के नेता व्यावहारिक हैं और समझते हैं कि ‘नेपाल फर्स्ट’ नीति के लिए भी भारत से मजबूत संबंध ज़रूरी हैं। हालाँकि विश्लेषकों ने आगाह किया है कि RSP 1950 की शांति और मित्रता संधि पर पुनर्विचार की माँग कर सकती है और कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा विवाद भी जस का तस बना हुआ है।
बालेन शाह की चुनौतियाँ
वरिष्ठ लेखक हरि बहादुर थापा ने कहा, “बालेन शाह को सरकार चलाने का अनुभव नहीं है और वे राज्य संचालन की जटिलताओं से अनजान हैं।” हालाँकि उन्होंने यह भी माना कि दो-तिहाई बहुमत के साथ वे संसद में सुधार आसानी से पास करा सकते हैं। Gen-Z की क्रांति से उपजी उम्मीदें अब बालेन के कंधों पर हैं। शुरुआत तो धमाकेदार हुई है, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है।

