नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी बिजली कंपनी NTPC ने एक ऐसा घर बनाकर दिखाया है जिसे देखकर हर कोई दंग रह गया। न सीमेंट, न सरिया, न महंगी ईंटें – बस कोयले की वह राख जिसे अब तक ‘कचरा’ समझा जाता था, उसी से तैयार हो गया एक पूरा मकान। नाम है ‘सुख’. कीमत है मात्र डेढ़ लाख रुपये और तैयार होने में लगते हैं केवल 15 से 20 दिन।
NTPC के इस इको-हाउस को पहली बार नई दिल्ली के प्रगति मैदान में भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले (IITF) में पेश किया गया। 300 वर्ग फुट के इस छोटे लेकिन संपूर्ण घर में बेडरूम, ड्राइंग रूम, बाथरूम और किचन – सब कुछ है. मेले में देश-विदेश से आए आगंतुकों ने जब इस घर को देखा तो उनकी आँखें फटी रह गईं।
■ क्या है यह फ्लाई ऐश?
थर्मल पावर प्लांट में बिजली बनाने के लिए जब कोयला जलाया जाता है, तो उससे बारीक राख निकलती है जिसे ‘फ्लाई ऐश’ कहते हैं। धुएं के साथ उड़ने वाले इन सूक्ष्म कणों को फिल्टर करके इकट्ठा किया जाता है। भारत में हर साल थर्मल पावर प्लांट्स से करोड़ों टन यह राख निकलती है. इसके निपटान के लिए विशाल ज़मीन चाहिए और इससे जल-स्रोत दूषित होने का खतरा भी रहता है. लेकिन अब NTPC ने इसी ‘समस्या’ को ‘समाधान’ में बदल दिया है।
NTPC ने इस राख को चूने (Lime), जिप्सम और रेत के साथ एक खास अनुपात में मिलाकर ऐसे इंटरलॉकिंग ब्लॉक्स तैयार किए हैं जो पारंपरिक लाल ईंटों से कहीं ज़्यादा मज़बूत और वज़न में हल्के हैं. यही ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की असली कहानी है।
■ लेगो की तरह जुड़ते हैं ब्लॉक्स
घर बनाने की यह प्रक्रिया किसी खिलौने को जोड़ने जितनी सरल है. फ्लाई ऐश के मिश्रण से पहले फैक्ट्री में बड़े-बड़े पैनल और ब्लॉक्स तैयार किए जाते हैं। फिर इन्हें निर्माण स्थल पर लाकर लेगो ब्लॉक्स की तरह एक-दूसरे में फिट कर दिया जाता है. इस ‘प्री-फैब्रिकेटेड’ तकनीक की वजह से पूरे काम में सीमेंट और पानी की खपत 80 प्रतिशत तक घट जाती है। इस निर्माण में पारंपरिक सीमेंट, रेत या सरिये की ज़रूरत नहीं पड़ती. जो काम पहले हफ्तों में होता था, वह अब दिनों में हो जाता है. जहाँ पानी की किल्लत है, वहाँ के लिए यह तकनीक किसी वरदान से कम नहीं।
■ डेढ़ लाख में घर – इसके पीछे का गणित
आज के दौर में जब एक कमरे का किराया ही हज़ारों में होता है, तो ₹1.5 लाख में पूरा घर? यह सवाल स्वाभाविक है। लेकिन NTPC का यह मॉडल इस शंका का जवाब तीन ठोस वजहों से देता है।
पहली बात – कच्चा माल लगभग मुफ्त मिलता है. पारंपरिक ईंटों के लिए उपजाऊ मिट्टी की महंगी खुदाई करनी पड़ती है। यहाँ फ्लाई ऐश बिजलीघर का ‘कचरा’ है जो NTPC के पास वैसे भी पड़ा रहता है।
दूसरी बात – निर्माण तेज़ है, इसलिए मज़दूरी का खर्च कम. 15-20 दिन में घर खड़ा होने का मतलब है – कम मज़दूर, कम दिन, कम पैसे।
तीसरी बात – सीमेंट और पानी की 80% बचत से घर की दीवारें खड़ी करने का खर्च ज़मीन पर आ जाता है. ये तीनों मिलकर उस ‘डेढ़ लाख’ को संभव बनाते हैं।
■ भूकंप का झटका? मौसम की मार? – ‘सुख’ पर कोई असर नहीं
सस्ता मतलब कमज़ोर – यह धारणा इस घर पर लागू नहीं होती। फ्लाई ऐश के ब्लॉक्स का वज़न कम होने की वजह से इमारत पर भार घटता है, जिससे भूकंप के झटकों को सहने की ताकत बढ़ती है। ये ब्लॉक्स थर्मल इंसुलेशन भी देते हैं – यानी गर्मियों में घर ठंडा और सर्दियों में गर्म रहेगा। बाढ़ और तूफान जैसे कठिन मौसम में भी यह घर मज़बूती से खड़ा रहता है।
■ PM आवास योजना को मिलेंगे पंख?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ‘सुख’ जैसी तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ‘सबके लिए पक्का घर’ का लक्ष्य बहुत जल्दी हासिल हो सकता है. देश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में आज भी करोड़ों परिवार कच्चे या जर्जर मकानों में रहते हैं। NTPC का यह मॉडल उनके लिए एक नई उम्मीद लेकर आया है।
एक तरफ फ्लाई ऐश से पर्यावरण को होने वाला नुकसान कम होगा, दूसरी तरफ लाखों परिवारों को सस्ता और मज़बूत घर मिलेगा। ‘सुख’ सिर्फ एक घर का नाम नहीं – यह उस सपने का नाम है जो अब पूरा हो सकता है।
◆ एक नज़र में – ‘सुख’ इको-हाउस
| घर का नाम | ‘सुख’ इको-हाउस (NTPC) |
| कुल लागत | ₹1.5 लाख |
| क्षेत्रफल | 300 वर्ग फुट |
| निर्माण समय | 15–20 दिन |
| मुख्य सामग्री | 80% फ्लाई ऐश के इंटरलॉकिंग ब्लॉक्स |
| खास बात | भूकंप-रोधी, थर्मल इंसुलेशन, मौसम-प्रतिरोधी |
| सीमेंट/पानी बचत | 80% तक कम |
| पहला प्रदर्शन | प्रगति मैदान, IITF, नई दिल्ली |

