Debate erupts in Bihar over Bhumihar Brahmins: भूमिहार समुदाय की पहचान का संकट फिर उभरा, ‘भूमिहार ब्राह्मण’ नाम की मांग पर सवर्ण आयोग विभाजित, अंतिम फैसला नीतीश सरकार के पास

Debate erupts in Bihar over Bhumihar Brahmins: बिहार के भूमिहार समुदाय की पहचान को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में छाया हुआ है। समुदाय के बड़े वर्ग की मांग है कि सरकारी दस्तावेजों, जाति प्रमाणपत्रों और राजस्व रिकॉर्ड में उन्हें ‘भूमिहार ब्राह्मण’ लिखा जाए, न कि सिर्फ ‘भूमिहार’। यह मुद्दा 2023 की जाति आधारित गणना से तेज हुआ, जिसमें समुदाय को केवल ‘भूमिहार’ के रूप में दर्ज किया गया था।

नाम बदलाव की मांग और विवाद की जड़
भूमिहार संगठनों का तर्क है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों में उन्हें ‘भूमिहार ब्राह्मण’ या ‘बाभन’ कहा गया है। ईडब्ल्यूएस (EWS) प्रमाणपत्र और भूमि रिकॉर्ड डिजिटलीकरण में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ विकल्प न होने से समुदाय में असंतोष बढ़ा। अक्टूबर 2025 में बिहार सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने इस पर सवर्ण आयोग से राय मांगी थी।

दिसंबर 2025 में सवर्ण आयोग की तीन बैठकें हुईं, लेकिन सहमति नहीं बनी। रिपोर्ट्स के अनुसार, आयोग के 5 सदस्यों में से अधिकांश ‘भूमिहार ब्राह्मण’ नाम के पक्ष में नहीं थे, जिससे मामला नीतीश कुमार सरकार के पास पहुंच गया। कुछ जगहों पर, जैसे राजस्व रिकॉर्ड में, उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा के निर्देश पर ‘भूमिहार ब्राह्मण’ लिखने की प्रक्रिया शुरू हुई है।

ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि
भूमिहारों का ब्राह्मण होने का दावा 1890 के दशक से है। ब्रिटिश सर्वेक्षक फ्रांसिस बुचानन ने उन्हें ‘मिलिट्री ब्राह्मण’ कहा, जबकि अन्य ने ‘अयाचक ब्राह्मण’ या ‘जमींदार ब्राह्मण’ के रूप में वर्णित किया गया। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने अपनी किताब ‘ब्रह्मर्षि वंश विस्तार’ में ब्राह्मणों की दो धाराओं — पुरोहित और कृषि-युद्ध से जुड़ी — का जिक्र किया था।
भूमिहार मुख्य रूप से गंगा के उपजाऊ मैदानों — मोकामा, बेगूसराय, लखीसराय, बक्सर आदि — में केंद्रित हैं। बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ. श्री कृष्ण सिंह इसी समुदाय से थे। 1990 के बाद राजनीतिक प्रभाव कम हुआ, जिसे ‘भूरा-बल साफ करो’ नारे और जातीय संघर्षों से जोड़ा जाता रहा है।

आर्थिक चुनौतियां और नई मांगें
2023 जाति गणना के अनुसार, भूमिहारों में 27.5% परिवार महीने में 6000 रुपये से कम कमाते हैं — सवर्णों में सबसे ऊंची गरीबी दर। इसी कारण कुछ लोग OBC दर्जे की मांग भी कर रहे हैं।

वर्तमान में मामला लंबित है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद न केवल पहचान का है, बल्कि आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों और आने वाली राष्ट्रीय जाति जनगणना का भी प्रतीक है। नीतीश सरकार पर सवर्ण वोट बैंक को साधने का दबाव है, लेकिन फैसला संवेदनशील होने से देरी हो रही है।

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