रैली में मुख्य रूप से समाजवादी छात्र सभा, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और अन्य वामपंथी-प्रगतिशील संगठनों के छात्र शामिल थे। छात्रों का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट का स्टे “सवर्ण विरोध” के दबाव में लिया गया फैसला है और इससे वंचित वर्गों के साथ अन्याय हो रहा है। उन्होंने UGC की उन गाइडलाइंस को तुरंत लागू करने की मांग की जिनमें हर संस्थान में इक्विटी कमेटी बनाने, शिकायत निवारण तंत्र मजबूत करने और भेदभाव करने वालों पर सख्त कार्रवाई के प्रावधान हैं।
“आरक्षण की भीख नहीं, संवैधानिक अधिकार”
प्रदर्शन के दौरान कई छात्रों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए। एक दलित छात्र ने बताया, “क्लास में अक्सर ताने मारते हैं कि तुम लोग ‘आरक्षण की भीख’ पर यहां आए हो। यह हमारा संवैधानिक अधिकार है, फिर भी अपमान सहना पड़ता है।” पीएचडी और फैकल्टी इंटरव्यू में भी जाति-सरनेम को आधार बनाकर भेदभाव के आरोप लगे। एक छात्रा ने कहा, “इंटरव्यू में योग्यता से ज्यादा जाति देखी जाती है। इसे हम ‘जाति देखने का इंटरव्यू’ कहते हैं।”
कैंपस की सोसायटियों में भी ऊपरी जाति के छात्रों का दबदबा होने की शिकायतें सामने आईं। एक छात्र ने कहा, “डिबेटिंग या कल्चरल सोसायटियों में अपनी जाति वालों को ही प्राथमिकता दी जाती है।” एक दिव्यांग ओबीसी छात्र ने दोहरे भेदभाव की बात कही—शारीरिक अक्षमता के साथ-साथ जाति के कारण भी उपेक्षा झेलनी पड़ती है।
RSS स्वयंसेवक ने भी माना भेदभाव
दिलचस्प बात यह रही कि प्रदर्शन में एक RSS से जुड़े स्वयंसेवक छात्र ने भी हिस्सा लिया और कहा, “वंचित समाज की पीड़ा को समझने के लिए संवेदना जरूरी है। जातिगत भेदभाव आज भी कड़वी सच्चाई है।” वहीं, कानून के एक छात्र ने तर्क दिया कि किसी कानून का दुरुपयोग होने की आशंका से उसे खत्म नहीं किया जाना चाहिए, जैसे दहेज या बलात्कार विरोधी कानूनों के साथ होता है।
रोहिथ वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी को समर्पित
छात्रों ने प्रदर्शन को रोहिथ वेमुला, डॉ. पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी जैसे उन छात्रों को समर्पित किया जिन्होंने कथित तौर पर संस्थागत जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या की। उनका कहना था कि रोहिथ वेमुला एक्ट जैसे राष्ट्रीय कानून के बिना कैंपस में समानता असंभव है।
हाल के दिनों में जंतर-मंतर और UGC मुख्यालय के बाहर भी इसी मुद्दे पर प्रदर्शन हुए हैं। दूसरी ओर, कुछ जनरल कैटेगरी छात्र संगठनों ने इन नियमों का विरोध किया है, दावा करते हुए कि इनका दुरुपयोग हो सकता है। लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों का संदेश साफ था—जब तक कैंपस में “इंसान को इंसान” नहीं समझा जाएगा और बराबरी का माहौल नहीं बनेगा, तब तक भारतीय विश्वविद्यालय सही मायने में प्रगतिशील नहीं बन पाएंगे।
यह मुद्दा अब देशभर के कैंपसों—JNU, BHU, UoH सहित पूरे देश में गूंज रहा है और आगे और बड़े आंदोलन की संभावना जताई जा रही है।

