India-US trade deal: सिर्फ व्यापार नहीं, चीन के खिलाफ भारत की रणनीतिक ताकत को मिला बूस्ट

India-US trade deal: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ टेलीफोन वार्ता के बाद बड़ा ऐलान किया — भारत और अमेरिका ने एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते पर सहमति जताई है। इस समझौते के तहत अमेरिका भारतीय निर्यातों पर लगने वाला टैरिफ 50% या 25% से घटाकर 18% कर देगा। बदले में भारत रूसी तेल की खरीद रोकने और अमेरिकी तेल, रक्षा सामग्री तथा विमान खरीदने पर सहमत हुआ है। यह समझौता महीनों की तनावपूर्ण वार्ताओं के बाद सामने आया है और इसे दोनों देशों के लिए जीत बताया जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता सिर्फ व्यापारिक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है। अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर टैरिफ घटाने से भारत को चीन (जिस पर 47% तक टैरिफ लगा हुआ है), पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे प्रतिस्पर्धियों पर स्पष्ट बढ़त मिलेगी। इससे टेक्सटाइल, आभूषण, इंजीनियरिंग गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और फार्मास्युटिकल्स जैसे सेक्टरों में भारतीय निर्यात को बड़ा फायदा होगा। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने कहा कि इस समझौते से विदेशी निवेशकों के मन में अनिश्चितता दूर हो गई है और ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति फिर से मजबूत हो गई है।

यह ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति वैश्विक कंपनियों की उस नीति को कहते हैं जिसमें चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत जैसे विकल्पों में निवेश बढ़ाया जाता है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस की अप्रैल 2025 की भारत यात्रा में इस समझौते की आधारशिला रखी गई थी। वैंस ने तब कहा था कि यह समझौता वैश्विक व्यापार को संतुलित करने और अमेरिका-भारत साझेदारी को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब इस समझौते से क्वाड, क्रिटिकल मिनरल्स और रक्षा सहयोग जैसे क्षेत्रों में भी गति आने की उम्मीद है।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस समझौते का स्वागत करते हुए कहा कि ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों को अब अमेरिकी बाजार में कम बाधाएं मिलेंगी, जिससे रोजगार और विकास को बढ़ावा मिलेगा। भारतीय उद्योग जगत ने भी इसे स्वागत किया है, हालांकि कुछ विश्लेषक पूछ रहे हैं कि रूसी तेल खरीद रोकने का फैसला भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या असर डालेगा।

यह समझौता भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत वैकल्पिक केंद्र बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते के साथ मिलकर यह भारत की अर्थव्यवस्था को 2030 तक अमेरिका के साथ 500 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार के लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद करेगा।

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