कोर्ट का संतुलित फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें बसंत पंचमी पर पूरे दिन केवल हिंदुओं को ही पूजा की अनुमति देने और मुस्लिमों की नमाज पर रोक लगाने की मांग की गई थी। कोर्ट ने दोनों पक्षों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए बीच का रास्ता निकाला। हिंदू भक्त सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा कर सकेंगे, जबकि मुस्लिम पक्ष को दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज की अनुमति रहेगी। कोर्ट ने प्रशासन को शांतिपूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं।
पृष्ठभूमि: लंबा विवाद और 2003 की व्यवस्था
भोजशाला परिसर को हिंदू वाग्देवी (सरस्वती मंदिर) मानते हैं, जिसे 11वीं शताब्दी में परमार राजा भोज ने बनवाया था, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित इस स्मारक को लेकर वर्ष 2003 में एक व्यवस्था हुई थी—हर मंगलवार और बसंत पंचमी को हिंदुओं को पूजा का अधिकार, जबकि हर शुक्रवार को मुस्लिमों को दोपहर 1 से 3 बजे तक नमाज की अनुमति। इस बार बसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ने से विवाद बढ़ गया था।
हिंदू पक्ष का तर्क था कि बसंत पंचमी पर अखंड सरस्वती पूजा का विशेष महत्व है और नमाज से व्यवधान हो सकता है। वहीं मुस्लिम पक्ष ने अपनी परंपरागत नमाज की मांग की। कोर्ट ने दोनों की धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए फैसला दिया।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
धार जिले में तनाव को देखते हुए प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की है। हजारों पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं ताकि कोई अप्रिय घटना न हो। दोनों समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की गई है।
मुख्य मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जिसमें परिसर के धार्मिक चरित्र और एएसआई सर्वे की रिपोर्ट पर विचार होना है। आज का फैसला केवल 23 जनवरी के लिए अंतरिम राहत है। दोनों पक्षों ने कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया है, हालांकि कुछ हिंदू संगठनों ने पूरे दिन की मांग पर असंतोष जताया है।
यह फैसला धार्मिक सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

