कंपनी के संस्थापक अमित टंडन ने बताया कि यह तकनीक सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देती है, जहां कचरा दोबारा उपयोग में आता है। पारंपरिक बैच रिएक्टरों के विपरीत, कंटीफ्लो जेनरेशन VI रिएक्टर लगातार चलता है और हमेशा सील रहता है, जिससे ऑक्सीजन नहीं घुसता और जहरीला धुआं नहीं बनता। प्लास्टिक को डिपॉलीमराइजेशन प्रोसेस से तोड़ा जाता है, फिर वैपर को अलग कर शुद्ध ऑयल निकाला जाता है। ठोस अवशेष ऑटोमैटिक सिस्टम से निकल जाते हैं।
पर्यावरणीय लाभ और प्रभाव
यह प्रोसेस ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को करीब 40% और फॉसिल फ्यूल उपयोग को 90% तक कम कर सकती है। भारत में हर साल लाखों टन मल्टी-लेयर प्लास्टिक लैंडफिल में जाता है, जिसकी रिसाइक्लिंग दर सिंगल डिजिट में है। पॉलीसाइक्ल की यह तकनीक अनंत लूप बनाती है, जहां प्लास्टिक बार-बार नए उत्पादों में बदलता रहता है बिना क्वालिटी खोए।
पॉलीसाइक्ल की वेबसाइट और हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी 2025 से इस तकनीक को लाइसेंसिंग मॉडल से फैला रही है। आरई सस्टेनेबिलिटी जैसी कंपनियों के साथ साझेदारी हो चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भारत की एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) नीति और प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स को मजबूत करेगी।
चंडीगढ़ प्लांट में चल रही यह प्रक्रिया प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ बड़ी उम्मीद है। टंडन कहते हैं, “समस्या प्लास्टिक नहीं, बल्कि उसका कचरा है। सही तकनीक से इसे संसाधन बनाया जा सकता है।”

