The Supreme Court and environmental protection: संविधान के 75 वर्ष बाद भी पर्यावरण संरक्षण का कर्तव्य अधूरा: सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय एस. ओका

The Supreme Court and environmental protection: भारतीय संविधान को अपनाए 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारा कर्तव्य अभी भी पूरा नहीं हो रहा है। यह कड़ी टिप्पणी हाल ही में सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायमूर्ति अभय श्रीनीवास ओका ने की है। इंडियन एक्सप्रेस के ‘आइडिया एक्सचेंज’ सत्र में उन्होंने कहा कि पर्यावरण की रक्षा हर नागरिक की जिम्मेदारी है, लेकिन फिलहाल यह काम केवल कुछ कार्यकर्ताओं तक सीमित रह गया है, जो मुद्दे उठाते हैं और अदालतों का दरवाजा खटखटाते हैं।

न्यायमूर्ति ओका ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं और न्यायाधीशों पर होने वाले हमलों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं को समाज से समर्थन और प्रशंसा मिलनी चाहिए, लेकिन इसके बजाय उन्हें धर्म-विरोधी या राष्ट्र-विरोधी करार दिया जाता है। न्यायाधीशों पर भी सोशल मीडिया के जरिए हमले होते हैं। उन्होंने 2017 का एक व्यक्तिगत अनुभव साझा किया, जब बॉम्बे हाई कोर्ट में शोर प्रदूषण और धार्मिक उत्सवों में सड़कों पर पंडाल बनाने के मामले में महाराष्ट्र सरकार ने उन पर पक्षपात का आरोप लगाया था।

ओका ने पर्यावरण प्रदूषण को जड़ से खत्म करने के लिए दृष्टिकोण में बदलाव की जरूरत बताई। उनका कहना है कि जब तक हर नागरिक यह नहीं समझेगा कि पर्यावरण संरक्षण उसका मौलिक कर्तव्य है, तब तक बदलाव मुश्किल है। संविधान के अनुच्छेद 51ए (जी) में स्पष्ट रूप से पर्यावरण संरक्षण को नागरिकों का मौलिक कर्तव्य बताया गया है।

हालिया सुप्रीम कोर्ट फैसलों में उतार-चढ़ाव
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में फैसले सुनाए, लेकिन कुछ में उलटफेर भी देखने को मिला। मई 2025 में ‘वनशक्ति’ मामले में पोस्ट-फैक्टो (बाद में दी गई) पर्यावरण मंजूरी को अवैध घोषित किया गया था, लेकिन नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को वापस ले लिया। इसी तरह अरावली क्षेत्र से जुड़े एक फैसले को भी कुछ ही महीनों में स्थगित कर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में कोर्ट के फैसले मिश्रित रहे।

वर्तमान में दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण और यमुना नदी जैसे मुद्दे लगातार सुर्खियों में हैं। हाल ही में शुरू हुई ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन 2026 भी व्याघ्र संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। 26 न्यायमूर्ति ओका की टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब पर्यावरण संरक्षण को लेकर सामूहिक जिम्मेदारी की जरूरत महसूस की जा रही है।

न्यायमूर्ति ओका ने अन्य मुद्दों पर भी खुलकर बात की, जैसे सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित होना, न्यायिक नियुक्तियां और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। लेकिन पर्यावरण पर उनकी यह टिप्पणी मौजूदा चुनौतियों को रेखांकित करती है कि संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद क्रियान्वयन में कमी बनी हुई है।

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