Bihar’s Madhubani District Court: 13 साल से कार की पिछली सीट को चैंबर बनाए महिला वकील अनीता झा, मधुबनी कोर्ट में लैंगिक भेदभाव की मार्मिक कहानी

Bihar’s Madhubani District Court: बिहार के मधुबनी जिला न्यायालय में पिछले 13 वर्षों से एक अनोखा नजारा देखने को मिलता है—एक सफेद टाटा टियागो कार पार्किंग में खड़ी होती है और उसकी पिछली सीट पर बैठकर वकील अनीता झा (57) अपने क्लाइंट्स से मिलती हैं, केस तैयार करती हैं और सुनवाई के लिए जाती हैं। कारण? महिला वकीलों के लिए अलग चैंबर की मांग को बार-बार ठुकराया जाना और पुरुष वकीलों द्वारा कब्जा कर लिया जाना।

मीडिया की आज प्रकाशित रिपोर्ट में अनीता झा की यह कहानी सामने आई है, जो न्याय व्यवस्था में लैंगिक भेदभाव की कड़वी हकीकत उजागर करती है।अनीता कहती हैं, “महिलाओं का कोई घर नहीं होता; शादी के बाद मायका भी उनका नहीं रहता। मेरा भी कोई घर नहीं—मेरा काम, मेरी पहचान, सब कुछ इस कार में है।”

2013 में महिला वकीलों के लिए चैंबर बनाया गया था, लेकिन कुछ ही दिनों में उसका साइनबोर्ड हटा दिया गया और कमरे पुरुष वकीलों के नाम कर दिए गए। अनीता ने इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उन्हें अपमान और धमकियों का सामना करना पड़ा। टेबल-कुर्सी लगाई तो उन्हें हटा दिया गया। अंत में उन्होंने कार को अपना ऑफिस बना लिया—यह उनका प्रतिरोध (प्रतिरोध) का प्रतीक बन गया।

ताजा अपडेट्स: यह स्टोरी आज सुबह प्रकाशित होने के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। कई यूजर्स और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने मधुबनी बार एसोसिएशन और जिला न्यायालय प्रशासन से महिला वकीलों के लिए अलग चैंबर की मांग की है। हालांकि, अभी तक बार एसोसिएशन या कोर्ट प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
बिहार की न्याय व्यवस्था में महिला वकीलों के साथ भेदभाव की यह पहली घटना नहीं है। हाल ही में एक अन्य मामले में भी महिला वकील को चैंबर खाली करने को कहा गया था, जिस पर बहस छिड़ी थी। 2 विशेषज्ञों का कहना है कि जिला अदालतों में बुनियादी सुविधाओं—like साफ शौचालय, पीने का पानी—की कमी भी महिला वकीलों के लिए बड़ी चुनौती है। अनीता खुद दिन भर पानी नहीं पीतीं ताकि गंदे शौचालय जाने की जरूरत न पड़े।

अनीता का संघर्षपूर्ण सफर: 28 साल से वकालत कर रही अनीता ने करीब 20,000 केस निपटाए हैं, खासकर POCSO, दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से जुड़े। उनके पिता कोर्ट में काम करते थे, जिससे बचपन से कानून की दुनिया से परिचय हुआ। 1989 में LLB करने वाली वे अपनी बैच की इकलौती महिला थीं। 2013 में पति की मौत के बाद उनका संघर्ष और बढ़ गया।
युवा वकील अतुल कुमार झा और सद्दाम आरिफ जैसे सहकर्मी अनीता को “सर्वश्रेष्ठ क्रिमिनल वकीलों में से एक” मानते हैं और उनके हौसले की तारीफ करते हैं।

यह कहानी न केवल अनीता के व्यक्तिगत संघर्ष की है, बल्कि पूरे देश की न्याय व्यवस्था में महिला प्रतिनिधित्व और सुविधाओं की कमी को रेखांकित करती है। उम्मीद है कि यह रिपोर्ट बदलाव की दिशा में एक कदम बनेगी।

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