तीन फुट की ऊंचाई लेकिन इरादे आसमान छूने वाले

Bhavnagar – Gujarat News: गुजरात के भवनगर जिले के एक छोटे से गांव गोरखी में जन्मे गणेश बरैया की कहानी हार मानना नहीं सिखाती। मात्र तीन फुट ऊंचे और 20 किलोग्राम वजन वाले इस युवा डॉक्टर को ड्वार्फिज्म के कारण 72 प्रतिशत चाल-चलन संबंधी विकलांगता है, लेकिन उन्होंने न केवल मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की साजिशों को नाकाम किया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट तक लड़कर अपनी पढ़ाई पूरी की। आज वे सर टी. सिविल अस्पताल में मेडिकल ऑफिसर के रूप में सेवा दे रहे हैं, जहां मरीज उन्हें सम्मान से ‘डॉ. गणेश’ कहते हैं।

गणेश का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। गांव में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने 12वीं कक्षा में 87 प्रतिशत अंक हासिल किए और 2018 में नीट-यूजी परीक्षा भी पास की। लेकिन एमसीआई ने उनकी विकलांगता का हवाला देकर एमबीबीएस प्रवेश से इंकार कर दिया। एमसीआई का तर्क था कि उनकी शारीरिक स्थिति डॉक्टर के रूप में आपातकालीन स्थितियों को संभालने में बाधक बनेगी। गणेश बताते हैं, “उस समय मैं बहुत निराश हो गया था। लेकिन मैंने हार नहीं मानी।”

स्कूल प्रिंसिपल डॉ. दलपतभाई कटारिया ने उनका साथ दिया, जो उनके मेंटर बने। आर्थिक तंगी के बावजूद प्रिंसिपल ने कानूनी खर्च उठाया। गणेश ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी हार मिली। हाईकोर्ट ने एमसीआई के फैसले को सही ठहराया। लेकिन गणेश ने बीएससी में दाखिला ले लिया और सुप्रीम कोर्ट में अपील की। चार महीने की कड़ी लड़ाई के बाद 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

अदालत ने कहा कि विकलांगता कोई बाधा नहीं हो सकती और विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016 के तहत उन्हें 2019 बैच में सीट आरक्षित की जाएगी।

2019 में भवनगर गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस शुरू हुआ। पढ़ाई के दौरान चुनौतियां कम न थीं। एनाटॉमी के डिसेक्शन क्लास में दोस्त आगे की सीटें खाली रखते, सर्जरी रोटेशन में कंधों पर बिठाकर ऑपरेशन टेबल दिखाते। प्रोफेसर और सहपाठी हर कदम पर सहयोग करते। गणेश कहते हैं, “मेरी ऊंचाई ने कभी सीखने में बाधा नहीं डाली। दोस्तों ने मुझे कभी अकेला नहीं महसूस कराया।” इंटर्नशिप के दौरान सर टी. अस्पताल में उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।

अब 25 वर्षीय डॉ. बरैया का पहला सरकारी पद सिविल अस्पताल में मिला है। वे ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देना चाहते हैं। उनका सबसे बड़ा सपना परिवार के लिए पक्का घर बनवाना है। आठ भाई-बहनों वाले किसान परिवार में कच्चे मकान में रहते हैं। गणेश कहते हैं, “खुशी महंगी होती है, लेकिन मेरी सैलरी से अब घर पूरा हो सकेगा।” उनके पिता ने कभी सोचा नहीं था कि बेटा इतना आगे बढ़ेगा।

यह कहानी न केवल व्यक्तिगत संघर्ष की मिसाल है, बल्कि मेडिकल शिक्षा में विकलांगता के भेदभाव पर सवाल भी उठाती है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला दो अन्य विकलांग उम्मीदवारों के लिए भी राहत लेकर आया। सोशल मीडिया पर डॉ. गणेश की वायरल वीडियो ने लाखों को प्रेरित किया है। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, वे कहते हैं, “कोई भी विकलांगता के कारण आपको रोक नहीं सकता। सपनों के लिए लड़ते रहिए।”

गुजरात सरकार और मेडिकल काउंसिल ने इस मामले पर कोई नया बयान नहीं दिया, लेकिन डॉ. बरैया की सफलता समावेशी शिक्षा की मांग को तेज कर रही है। वे न केवल डॉक्टर हैं, बल्कि लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत भी।

यहां से शेयर करें