क्या मेनस्ट्रीम मीडिया व सोशल मीडिया का फर्क मिटता जा रहा है?

नई दिल्ली। मौजूदा केंद्र सरकार की सबसे योग्य मंत्रियों में शामिल सुषमा स्वराज आजकल ट्रोल्स के निशाने पर हैं. वजह है आनन-फानन कार्रवाई करके यूपी की एक महिला की मदद करना। तन्वी सेठ नाम वाली महिला ने यह शिकायत की थी कि पासपोर्ट ऑफिस में उन्हे सिर्फ इसलिए भेदभाव का शिकार होना पड़ा क्योंकि उनके पति मुस्लिम है। तन्वी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट किया. इसके बाद विदेश मंत्रालय ने फौरन कार्रवाई की और तन्वी को उनका पासपोर्ट मिल गया. लेकिन कहानी में पेंच उस वक्त आया जब भेदभाव के आरोपी पासपोर्ट अधिकारी ने यह कहा कि तन्वी ने पासपोर्ट फॉर्म में कुछ जानकारियां छुपाई, इसलिए पूछताछ करना उनका फर्ज था. उन्होंने तन्वी के साथ कोई बदसलूकी नहीं कि बल्कि वे सिर्फ अपना काम कर रहे थे।
आरोपी अधिकारी विकास मिश्रा का बयान आते ही हजारों लोग मुस्लिम तुष्टिकरण का इल्जाम लेकर सुषमा स्वराज पर टूट पड़े. तन्वी का आरोप और पासपोर्ट अधिकारी की सफाई इस मामले के दो पक्ष हैं. कौन सही है और कौन गलत यह बात जांच पूरी होने के बाद सामने आएगी. इस लेख का विषय तन्वी पासपोर्ट प्रकरण नहीं बल्कि इससे जुड़ा मीडिया कवरेज और इस बहाने मौजूदा दौर की पत्रकारिता पर चर्चा है। मौजूदा दौर में जब हम मीडिया की बात करते हैं तो उसका सीधा रेफरेंस इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से होता है. हालांकि प्रिंट मीडिया की भूमिका कम नहीं हुई है, खासकर हिंदी और बाकी क्षेत्रीय भाषाओं में छपने वाले अख़बारों की। डिजिटल माध्यम भी बहुत तेजी से पांव पसार रहा है. लेकिन इन सच यह है कि पिछले डेढ़ दशक में समाज पर सबसे ज्यादा प्रभाव इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का रहा है. इसलिए सबसे ज्यादा बात न्यूज़ चैनलों की होती है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के काम करने के तौर-तरीके हमेशा से से सवालों के घेरे में रहे हैं. पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों को ना मानना, ख़बर ब्रेक करने की हड़बड़ी में आधे-अधूरे तथ्य पेश करना, सतर्कता ना बरतना, गलती होने पर माफी ना मांगना, फूहड़ तरीके से निजता का हनन और कवरेज़ के दौरान अंसवेदनशीलता बरतना. दर्जनों ऐसी बातें हैं, जिन्हें लेकर दर्शकों को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से शिकायतें रही हैं।
सेल्फ रेगुलेशन के तमाम दावों के बावजूद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के काम करने तौर-तरीको में कोई बदलाव नहीं आया है. डिजिटल युग की शुरुआत के बाद आजकल खबरें न्यूज़ चैनलों से पहले ट्विटर और फेसबुक पर ब्रेक होती हैं. इस लिहाज से ख़बरें ब्रेक करने के मामले में चैनलों की भूमिका अगर खत्म नहीं हुई तो कम ज़रूर हो गई है. नयी परिस्थितियों में चैनलों के लिए मौका अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित करने है। सोशल मीडिया पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है. इसलिए वहां आनेवाली ख़बरों की वैधता हमेशा संदिग्ध रहेगी. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास एक संपादकीय ढांचा रहा है. ऐसे में न्यूज़ चैनलों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे तथ्यों की जांच-परख के बाद ख़बर जारी करें. आखिर इस देश में कोई तो होगा जो तथ्यों की जांच के बाद उसे वैधता प्रदान करेगा।

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