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स्कूल से ही क्यों खरीदें यूनिफॉर्म-किताबें

By: khan.shaheen
18-04-2017 13:50:38 PM

जय हिन्द जनाब की मुहिम ला रही रंग अब अभिभावक बता रहे स्कूलों के कारनामे

1 हर वस्तु में स्कूल प्रबंधन खोजता है पैसा
1 बिना बिल दिए यहां बिकता है सामान
1 वाणिज्यकर विभाग अंजान, कालाधन कैसे हो समाप्त


नोएडा। शहर में फीस वृद्धि का मामला जोरों-शोरों से उठाया जा रहा है। नोएडा विधायक पंकज सिंह ने इस मामले को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष भी उठाया जिसके बाद जिला प्रशासन हरकत में आया और तत्काल प्रभाव से सिटी मजिस्ट्रेट रामानुज के नेतृत्व में समिति का गठन किया गया। यह समिति जांच पड़ताल कर रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर छात्रों को स्कूल से ही किताबें और यूनिफॉर्म लेने के लिए क्यों विवश किया जाता है? सरकार की गाइडलाइन में साफ कहा गया है कि कोई छात्र कहीं से भी किताबें और यूनिफार्म खरीद सकता है। फीस बढ़ोतरी का तो मामला अलग है लेकिन स्कूल प्रबंधन छोटे-छोटे चीजों में भी कमाई करते हैं। अभिभावक बच्चों के भविष्य को देखते हुए इन सब बातों से अंजान बने हैं। स्कूल प्रबंधन अपनी मनमर्जी से ही स्कूल में एनसीआरटी छोड़कर अन्य पब्लिकेशन हाउस की किताबें बच्चों को पढ़ाते हैं साथी यूनिफॉर्म में ऐसे छोटे-छोटे बदलाव किए जाते हैं जो मार्केट में आसानी से न मिल सके। इस सब के पीछे सबसे बड़ा राज है कमीशन खोरी का।

 

 


जय हिन्द जनाब को बताया गया है कि स्कूलों में बिकने वाली किताब पर पब्लिकेशन हाउस की ओर से 340 परसेंट कमीशन दिया जाता है। जरा सोचिए एक ही स्कूल में हजारों छात्र होते हैं और हजारों की तादाद में ही किताबें बिकती हैं जो एनसीईआरटी की किताबें 100 से 50 के बीच आती हैं, वहीं किताबें पब्लिकेशन हाउस छोटे-छोटे बदलाव करने के बाद 300 से 400 के बीच बेचते हैं। ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि स्कूल इसमें भी किस हद तक कमाई कर रहे हैं। स्कूलों की वैसे कमाई केवल फीस के रूप में ही दिखती है लेकिन कुछ ऐसी भी चीजें हैं जो पूरी तरह छूटी हुई हैं। यूनिफॉर्म को ही ले लीजिए इसमें भी स्कूल अलग से कपड़ा बनवाते हैं और कलर कोडिंग ऐसी कराते हैं जो बाजार में न मिल पाए। कुछ स्कूल कपड़ा मिल मालिकों के सामने यह शर्त रखते हैं कि ऐसा कपड़ा वह बाजार में न भेजें। कंपटीशन के दौर में स्कूलों का एकाधिकार दिखाई दे रहा है। सवाल यही है कि इस मोनोपोली को खत्म करने के लिए सरकार कदम क्यों नहीं उठाते। बताया जा रहा है कि स्कूल संचालकों में बहुत बड़ी संख्या में राजनेता सीधे-सीधे शामिल है। इसके अलावा जो खुद शामिल नहीं है उनके बच्चे या फिर रिश्तेदार स्कूल खोलकर बैठे हैं।


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