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नोएडा >> स्कूलों की ‘लूट’ के खिलाफ बड़े आंदोलन की तैयारी

By: janabhind
17-04-2017 14:52:58 PM

[मोहम्मद इमरान] आज नोएडा अपने 41 वर्ष पूरे लेकिन स्कूलों को सब्सिडी पर दी गई सब जमीन के बावजूद शिक्षा महंगी होती जा रही है। स्कूल प्रबंधक जरा भी नीयम कायदे कानून मानने को तैयार नहीं है। जगह-जगह अभिभावक धरने-प्रदर्शन कर रहे हैं और मनमानी करने वाले स्कूलों की शिकायतें दर्ज करा रहे हैं। 
 
 
 
स्कूलों की ‘लूट’ यानि तरह-तरह की एक्टिविटीज, किताब, रजिस्टर, स्कूल यूनिफार्म, बिल्डिंग मेंटिनेंस आदि के नाम पर ली जाने वाली धनराशि है। अभिभावक ऐसे में बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं।  दर्जनभर से अधिक ऐसे स्कूल हैं जो महीने का 30 हजार से अधिक रुपये अभिभावकों से शिक्षा की बंदूक दिखाकर ले लेते हैं। 
 
प्रशासन के हस्तक्षेप का भी कोई असर नहीं 
आजकल जिला प्रशासन ने स्कूलों की फीस वृद्धि में हस्तक्षेप किया है लेकिन इसका कोई खासा असर दिखने को नहीं मिल रहा है। स्कूलों का रवैया जस का तस है। कई-कई बार फीस वृद्धि करने वाले स्कूल अब भी इसमें वृद्धि करने के फिराक में है और बढ़ी हुई फीस को वापस लेते नहीं दिख रहे। जिला प्रशासन की ओर से गठित समिति केवल दो स्कूलों तक ही सिमट कर रह गई है क्योंकि इन दोनों स्कूलों की शिकायत लिखित रूप में मिली थी। सवाल यह है कि जिले में ऐसा कौन सा कॉन्वेंट स्कूल है जिसने फीस न बढ़ाई हो और अपने नियम न लगाए हों। 
 
आरटीई कानून की उड़ रही धज्जियां
छह से चौदह वर्ष तक के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए अनुच्छेद 21 और 45 में संशोधन किया गया। राइट-टू-एजुकेशन एक्ट बनने के बावजूद बच्चों अब भी स्कूलों में दाखिले नहीं मिल पा रहे हैं। जिन्हें मिलते हैं वे अभिभावक स्कूलों की इच्छाएं पूरी नहीं कर पाते।
 
प्रदर्शन करेंगे तो बच्चों से लेंगे बदला
अभिभावकों को मन में एक डर और है यदि वे स्कूलों के बाहर फीस वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन करते हैं तो उनके बच्चों को स्कूल प्रबंधन की तरफ से अप्रत्यक्ष तौर पर परेशान किया जाएगा। इतना ही नहीं बच्चों की पढ़ाई पर इसका सीधा असर पड़ेगा। 
 
 
स्कूलों में अलग-अलग तरीकों से हो रही लूट पर शैलेंद्र भाटिया ने अपने उद्गारों को कविता में यूं पिरोया...
मैं कॉन्वेंट स्कूल हूं
मैं कॉन्वेंट स्कूल हूं
बेचता हूं किताबें 
कलम, कॉपियां, बस्ते, टिफन, टाई और अभिाभावकों के सपने
यहां हर दिन कोई न कोई एक्टिविटी है
हर एक का दाम है
एक डायरी है जिस पर लिखे जाती हैं, वस्तु और संदेश 
एक कीमत के साथ।
समाजवाद से छूटा हूं 
पूंजीवाद का पोषक हूं
किसानों और गरीबों से दूर 
कुछ लोगों के लिए उपलब्ध हूं
मैं कॉन्वेंट स्कूल हूं
मैं उनके ज्यादा करीब हूं 
जो बनान चाहते थे कुछ 
पर नहीं बन पाये
जो अभी देखते हैं सपनों को 
उनके अधूरे सपनों का सौदागर हूं मैं
मैं कॉन्वेंट स्कूल हूं। 
मैं देशभक्त भी हूं 
सारे राष्टï्रीय दिवस मना लेता हूं
समय पर कैंडल जलाता हूं
हर तरह के डे
जो अपने देश में नहीं मनता
वो भी मनाता हूं मैं
फिर 
इन सभी की एक मैगजीन बनाता हूं
फिर उसे बेचता हूं मैं
मैं कॉन्वेंट स्कूल हूं। 
याद रहे फोटो के पैसे 
अलग से लेता हूं
मैं कॉन्वेंट स्कूल हूं


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