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Exclusive >> रिफ्यूजी कैम्प की दर्दभरी दास्तां : इंसान का इंसान से नहीं भाईचारा

By: admin
06-03-2017 18:45:18 PM

शाहीन खान, नई दिल्ली

कहते हैं मुस्कुराने से गम कम होते हैं। लेकिन लगता जैसे इन बच्चों को अपनी तकलीफ का शायद अभी अहसास नहीं। बात बर्मा से आए उन 48 परिवारों की है जो कालिन्दी कुंज के समीप खादर निक ट कंचनजुंगा में रह रहे हैं।

बदले तो नहीं हैं वो दिल-ओ-जान के करीने,
आँखों की जलन, दिल की चुभन अब भी वही है।


जय हिन्द जनाब की संवाददाता जब इस रिफयूजी कैम्प में गई तो  वहां के लोगों का  दर्द ब्यान नहीं किया जा सकता। उनकी दैनिक स्थिति इतनी खराब है कि वह लोग खाने पीने के साथ पानी  पीने तक के लिए मोहताज हैं।

 


मोहम्मद हारुन  जो यहां 2012 मैं बर्मा से आकर रिफयूजी कैम्प में बसे उन्होंने बताया कि यहां हमें यूएन कार्ड के जरिये भेजा गया है हम 48 परिवार हैं यह जगह हमें जकात फाउंडेशन की ओर से  दी गई है जिसमें हम खुद  लकड़ी और फट्टों की मदद से  रहने लायक बनाया है.

हारून ने बताया कि यहां के लोग मजदूरी कर अपने तो कर अपना गुजर कर रहे हैं लेकिन इसमें सबसे बड़ी परेशानी यह है कि  हम लोगों को यहां की भाषा नहीं आती और हम यदि कहीं मजदूरी करते भी हैं  तो हमें पूरी मजदूरी नहीं दी जाती।

इन्हीं में से एक बीना ने बताया कि हम यहां कैसे जी रहे हैं कोई देखने नहीं आता हमें जो यूएन कार्ड की ओर से खर्चा दिया जाना चाहिए रहने के लिए जगह दी जानी चाहिए वो हमें नहीं दी जाती और यहां पीने तक  पानी  दूर-दूर जाकर लाना पड़ता है। साथ ही वो कहती हैं की हां हमें इस देश ने यहां रहने की जगह दी उसके हम आभारी हैं लेकिन अगर हम यहां भी भूखे प्यासे दिन गुजारेंगे तो हम कैसे जी पाएंगे।

डॉक्टर जाफर जो की जकात फाउंडेशन के ही सदस्य हैं उन्होंने इन बच्चों में से करीब चालीस से ऊपर बच्चों का दाखिला पब्लिक स्कूल में कराया है और इनकी पढ़ाई का खर्चा जकात फाउंडेशन अपनी तरफ से उठा रहा है यह बहुत बड़ी मदद साबित हो रहा है।

हम चाहते हैं कि हमारे रिफ्यूजी कार्ड के तहत जो सुविधाएं दी जाती हैं वह सुविधाएं मुहैया कराई जाए ताकि हम लोग कुछ हद तक अपनी जिन्दगी का निर्वाह कर सकें। - मौ हारून


फाउंडेशन की ओर से 11 सौ गज के प्लॉट इन 48 परिवार को मुहया कराया है । यह कैसे मुमकिन है कि इतनी जगह में यह सभी परिवार अपना गुजारा कर लें। सरकार की तरफ  इन्हे यहां रहने की जगह दी गई।  दूसरे कंट्री के रिफ्यूजियों को सभी कुछ सुविधाएं दी जाती हैं जिसमें खाना रहना हर तरह की सुविधा शामिल हंै। लेकिन  हमें यह सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं। यदि सरकार ने इनको सहारा दिया है तो या तो वह इनको नागरिकता दे या फिर जिस तरह से यूएन अपने शरणार्र्थियों को रहने खाने की सुविधाएं उपलब्ध कराता है उसी तरह इन परिवारों को भी वह सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।

हम सभी शरणार्थियों को  एक जगह कर दिया जाए और हमें एक छत का इंतजाम कर दे सरकार तो हम अपने बच्चों को पाल सकेंगे वरना हम जी नहीं पाएंगे। - मौनीसा


मालूम हो कि बर्मा में आज भी ऐसे हालात हैं जिसमें दस-पन्द्राह लाख लोग इन्हीं हालातों में जिन्दगी जीने को मजबूर हैं। यूएन ने इस तरह के लाखों लोगों को दूसरे देशों मैं भेजा है।  जिसमें बंग्लादेश,  जम्मू और थाईलैंड और दूसरे पड़ोसी देश शामिल हैं। इंडिया में मेवात और कुछ हरियाणा में  ऐसे कई परिवार रह रहे हैं। फिलहाल सिटीजनशिप इन लोगों में से किसी को नहीं दी गई है। यह लोग बिना बिजली, पानी की जरूरतों के  कैसे जी रहे हैं यह बड़ा सवाल है। सरकार का क्या सिर्फ इस तरह से मदद कर देना भर ही काफी है या इनकी ओर अधिक ध्यान देकर हम इनकी जिन्दगी सुधार सक ते हैं।


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