स्वास्थय: बेतरतीब जिंदगी से मनोरोग

तथाकथित आधुनिक जीवनशैली ने हमें जो यादगार ‘उपहारÓ दिए हैं उनमें मानसिक रोग प्रमुख है। बड़े शहरों में तो स्थिति और भी भयावह है। दिल्ली के एम्स, विमहंस, आरएमएल, जीबी पंत और इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड अप्लायड साइंसेज अस्पतालों की ओपीडी में रोज पांच से छह हजार मनोरोगियों का उपचार होता है।
मनोरोगों का एक प्रमुख कारण है महानगरीय जीवन के अभिन्न अंग के रूप में जाना जाने वाला एकाकीपन। महानगरों में रिश्तों के बीच दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि आज पड़ोसी भी एक दूसरे को नहीं पहचानते। इस एकाकीपन से पैदा हुआ तनाव लोगों की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है। हमारे मस्तिष्क और शरीर को इसकी कीमत कई बीमारियों के रूप में चुकानी पड़ रही है। खासकर जीवनशैली और आदतों से जुड़ी डिप्रेशन, एंग्जाइटी, मेनिया आदि तेजी से पैर पसार रहे हैं।
सिजोफ्रेनिया
यह एक जटिल मानसिक रोग है। पुष्पांजलि अस्पताल के कंसलटेंट मनोचिकित्सक डॉ. अजय निहलानी कहते हैं, ‘इसमें रोगी के लिए वास्तविक और अवास्तविक चीजों में भेद करना मुश्किल हो जाता है। तर्क करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। कई मरीजों को अजीब तरह की आवाजें सुनाई देने लगती हैं। वह कई तरह के भ्रम में जीने लगता है। इसके मरीज अक्सर अल्जाइमर्स और डिमेंशिया से भी पीडित होते हैं।Ó इसका प्रमुख कारण एकाकीपन, बेरोजगारी, गरीबी और नशीली दवाओं का सेवन होता है। बच्चे की अधिक पिटाई भी आगे चलकर इस बीमारी का का कारण बन सकती है।
अल्जाइमर
पारस अस्पताल के वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट, डॉ. रजनीश कुमार के अनुसार, ‘यह घातक मानसिक रोग है। इसमें मस्तिष्क की कोशिकाओं का आपस में संपर्क खत्म हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। यह 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में पाया जाने वाला सबसे सामान्य मस्तिष्क रोग है।Ó
पार्किसन
यह एक न्यूरो डिजनरेटिव बीमारी है। हमारे शरीर की गति डोपामिन नामक रसायन द्वारा नियंत्रित होती है। वह रसायन मस्तिष्क की विभिन्न तंत्रिकाओं के बीच संदेशवाहक का काम करता है। जब डोपामिन बनाने वाली कोशिकाएं मृत हो जाती हैं तो पर्किसन के लक्षण प्रकट होते हैं। इसमें हाथ पैरों में कंपकपी, शरीर का संतुलन बिगडऩा, मांसपेशियों का कड़क होना तथा अत्यधिक थकान होना आम बात हो जाती है। बाद में मरीज गहरे डिप्रेशन में चला जाता है।
मेनिया
मेनिया यानी उन्माद रोग एक गंभीर मनोरोग है। इसमें रोगी अत्यंत उत्तेजित या हिंसक हो जाता है। तनाव इस रोग में ट्रिगर का काम करता है। यह एक खतरनाक मानसिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति इतना सक्रिय और उत्तेजित हो जाता है कि उसका वास्तविकता से संपर्क टूट जाता है।
इसके कारण
मशहूर मनोवैज्ञानिक अरूणा ब्रूटा कहती हैं, ‘आनुवांशिकी कारणों के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय कारक भी मानसिक स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जो माता-पिता अपने करियर और महत्वाकांक्षाओं के कारण बच्चों को वक्त नहीं दे पाते, जो बच्चे गरीबी में पले-बढ़े होते हैं, जिनकी मां बचपन में मर जाती हैं या पिता शराब पीकर बच्चों की पिटाई करते हैं उनमें मानसिक रोग होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।Ó
डॉ. रजनीश कुमार के अनुसार, ‘सिर में लगी घातक चोट, संक्रमण, तनाव, अनिद्रा और डिप्रेशन भी व्यक्ति को मानसिक रोगी बना सकता है। लंबे समय तक तनाव रहने से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है। तनाव के कारण शरीर में कई हार्मोन स्रावित होते हैं जिनमें से कॉर्टीसोल भी एक है। वह मस्तिष्क को नई सूचनाएं ग्रहण करने और पहले से मस्तिष्क में इकटी सूचना को याद करने में रूकावट डालता है।Ó
क्या है उपचार
डॉ. ब्रूटा कहती हैं, ‘हमारे देश में मानसिक रोगों के प्रति जागरूकता का अभाव है। 90 प्रतिशत रोगी तो उपचार के लिए कभी अस्पताल ही नहीं जाते। कई मामलों में यदि रोग का पता चल भी जाता है तो मरीज और उसके परिवार वाले खामोशी से सहते-रहते हैं। कहां से सहायता प्राप्त की जाए, यह भी नहीं जानते। अगर मरीज को सही समय पर उचित इलाज उपलब्ध कराया जाए तो कई मानसिक रोगों का पूरी तरह इलाज संभव है।Ó
फार्मेकोथैरेपी
दवाओं से किसी मानसिक रोग के उपचार को फार्मेकोथैरेपी कहते हैं। कई आधुनिक दवाएं बहुत अच्छी हैं जिनसे मस्तिष्क को स्थिर कर रोगी का इलाज किया जाता है।
साइकोथैरेपी
सामान्यत: साइकोथैरेपी का उपयोग मानसिक रोगों या भावनात्मक आघातों के लिए किया जाता है। इसमें मरीज से विस्तार से बातचीत कर उसकी मानसिक अवस्था का अध्ययन किया जाता है और रोग के कारणों का पता लगाया जाता है। इस थैरेेपी के द्वारा रोगी को परिस्थितियों से तालमेल बिठाने और खुद को स्वीकार करने में मदद की जाती है।
बिहेवियर थैरेपी
यह थैरेपी इस अवधारणा पर आधारित है कि सामान्य और असामान्य दोनों बर्ताव ही सीखे जा सकते हैं। यह बिहेवियरल डिसऑर्डर दूर करने की पद्धति है। इसमें रोगी के बर्ताव का निरीक्षण कर उसके लक्षणों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। यह पद्धति डिप्रेशन, उत्तेजना, भय, उन्माद रोग में मददगार साबित होती है।
दिमाग को यूं रखें दुरूस्त
नए शोधों ने यह साबित किया है कि मस्तिष्क भी मांसपेशियों के समान ही कार्य करता है। जितना अधिक इसका इस्तेमाल होगा, यह उतना ही शक्तिशाली होगा। वर्ग पहेलियां हल करना मस्तिष्क को चुस्त-दुरूस्त रखने में अहम भूमिका निभाता है। व्यायाम से दिमाग में ऑक्सीजन का प्रवाह बढ़ता है जिससे तनाव घटाने में मदद मिलती है। मानसिक शक्ति बढ़ती है और याददाश्त मजबूत होती है।
योग
मानसिक रोगों, उत्तेजना और भूलने की बीमारी में मददगार साबित होते हैं। योगासन शरीर के विभिन्न अंगों में समन्वय स्थापित करने और ध्यान केंद्रित करने में मदद करते हैं। शरीर में 200 से अधिक न्यूरोट्रांसमीटर(नर्व सिग्नल) होते हैं। इनकी उपयुक्त कार्यप्रणाली के लिए मस्तिष्क को कुछ जरूरी तत्वों की जरूरत पड़ती है। इनमें अच्छी क्वालिटी की वसा और प्रोटीन वाली डाइट प्रमुख होते हैं।
अपनाएं कुछ अहम बातें
निश्चित दिनचर्या : अपनी दिनचर्या को नियमित बनाएं। अगर आपका काम अनियमित दिनचर्या वाला है तो दिनचर्या पर ध्यान देना और जरूरी है। अनियमित दिनचर्या से तनाव बढऩे की आशंका बढ़ जाती है। अच्छा समय बिताएं ह्व अपनों के साथ अच्छा समय बिताएं। आउटिंग पर जा सकते हैं, साथ खाना खाएं, बच्चों के साथ खेलें।
थोड़ा समय अपने लिए भी : कम-से-कम 15 से 20 मिनट समय अपने लिए निकालें। इस समय का उपयोग व्यायाम,योग, प्राणायाम और अपनी किसी हॉबी के लिए करना चाहिए।
ईष्र्या, द्वेष और क्रोध से दूर रहें ह्व ये तीनों दोष शरीर में कई विकार पैदा करते हैं। ये आपके अंदर बुरी भावनाओं को बढ़ावा देते हैं जिससे अंतत: तनाव और आपके दिमाग पर दबाव बढ़ता है। आदर व स्नेह ह्व दूसरों के प्रति आदर और स्नेेह का भाव रखें। इससे आपको आदर और स्नेेह मिलेगा और खुशी का अहसास होगा।

Posted by on January 28, 2012. Filed under photo, लाइफस्टाइल. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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